तेरा मुझसे है पहले का नाता कोई .....

शुक्रवार, जून 29 By मनवा

समन्दरों के किनारों पर आती -जाती लहरों के साथ , इतनी रेत क्यों आ जाती है माँ ? देखो  ना , कितनी बुरी तरह चिपक गयी मेरे पैरों से | अब ये कैसे  हटेगी ? मैंने कहा -थोड़ी देर रुको , अभी बहुत सी लहरे इन्हें खोजती हुई आयेगीं | और इन्हें अपने साथ ले जाएगी | अगले ही पल , शोर मचाती लहरों ने आकर किनारों को भिगो दिया और रेत को बहा ले गयी | 
मैं सोचने  लगी  कि, इन सागर की बूंदों का क्या रिश्ता है रेत के साथ | एक ठोस तो दूजी तरल |  कब से साथ है दोनों ? कौन जाने  कहाँ -कहाँ से बहकर आई हैं | प्रेम की नदियाँ कितनी सदियों से अपने प्रियतम  पहाड़ों को मना  रही है | ये पहाड़ कैसे जस के तस है | निष्टुर , बेखबर , कठोर प्रेमी की तरह | जितनी बार भी लहरें टकराती है  पहाड़ों से | उतनी बार कुछ रेत के कण अपने साथ लिए जाती है | कितनी बूंदों के बदले कितनी  रेत लाती है कौन जाने ? क्या -क्या देजाती है | क्या -क्या ले आती हैं | कौन करे हिसाब ? पहाडो को छू-- छू कर  रेत -रेत कर देती हैं | खुद सिमट कर बूंद बूंद हो जाती है | कितनी सदियों का हिसाब है इनके  भीतर | कौनसा रेत का कण किस बूंद से जुड़ा है कौन जाने ? और कौनसी बूंद उस कण को किस देश ले जाएगी ये भी तो नहीं पता | क्या पहाड़ों को कभी नदियों की याद आती है ? कैसे आएगी ? इक दिन पहाड़ ने कहा -तुम मेरे भीतर ही तो बहती हो |  फिर कैसी याद ? नदी बोली , तुम अपनी जगह से कभी हिलते नहीं | अपने गुरुर में अकड़े से क्यों रहते हो ? मेरे भीतर भी तो तुम्हारे कण  हैं, मैं फिर बार -बार क्यों चली आती हूँ | मैं भी अगर ठहर जाऊं | एक जगह तो ??? पहाड़ मुस्काये ..नदी रूठ कर चल दी | फिर एक बार पहाड़ से कुछ रेत झड़ गयी | नदी  के संग बह गयी | एक बार फिर से वो पहाड़ वो चट्टान थोड़ी कमजोर हो गयी | जितनी बार  नदी आती उतनी बार चट्टान थरथराती | नदी मुस्काती ..क्यों नहीं बह जाते मेरे साथ ...एक दिन हर चट्टान डूब  जानी है मेरे भीतर | रेत और बूंद का नाता ,पहाड़ों और नदियों जितना ही पुराना है | 

किस दिन सागर की तलहटी में चुपके से किस सीप के ह्रदय में कौनसी रेत समा जायेगी और अनमोल मोती बन कर चमक जाएगी कौन जाने ? रेत  का हर कण अपनी- अपनी सीप खोजता होगा | जो उसे सुन्दर  मोती बना दे | कितने रेत के कण , सदियों से सीप की तलाश में टूट गए होंगे | बिखर गए होंगे | ये रेत के कण कैसे बनते हैं ? और क्या नाता है इनका समन्दर से , बूंदों से |
 सुना है , कहीं दूर रेगिस्तानों में रेत की नदियाँ बहती है | रेत के झरने बहते हैं | बवंडर  उठते हैं , रेत के तूफ़ान क़यामत ढाते हैं | क्यों रेत की फितरत बूंदों की तरह है ? बूंदें भी तो तूफ़ान उठा देती है | बूंद में समन्दर समाया है या समन्दर में बूंद ? उसी  तरह रेत में रेगिस्तान समाया या रेगिस्तान में  रेत का कण ? कौन जाने ? 
इन बूंदों ने  ना जाने  प्रेम के कितने  टाइटैनिक डूबा दिए और इन रेत के बवंडरों ने  ना जाने कितने काफिलों को निगल लिया | कितनों को रस्ता भुला दिया | कौन जाने ..
कहीं ये  दोनों एक तो नहीं है | दोनों ही चमकती हैं | दोनों साथ रहती है | दूर -दूर बसने पर भी इनका प्रेम कम  नहीं होता | अब देखो ना जलता, चुभता रेगिस्तान अपने दिल में  कैसे मीठे पानी का मरूद्यान समेटे है | उसी तरह खारा समन्दर भी अपने दिल की अतल गहराई में रेत को समेटे है |सदियों से लोग मृग को दीवाना बताते  आये हैं | की वो रेत के कणों को पानी समझ कर उसके पीछे भागता है और इक़ दिन प्यासा ही मर जाता है | गलत बात , मृग दीवाना नहीं सयाना है |उसके पास द्रष्टि है |  वो  जब देखता है की रेत का हर कण बूंदों की तरह क्यों दिख रहा है | चुभती जलती रेत , तड़प के बूंद सी क्यों दिखने लगी |प्रेम  की ऐसी पराकाष्टा देख  वो हैरानी से मर जाता होगा | 
क्या नाता है दोनों का ? कहीं  ये दोनों एक ही ग्रह से तो नहीं आई ? प्रेम की देवी के आसूँ जब उनके सुन्दर गालों से लुढ़क कर धरती पर गिरे होंगे तो दुख से रेत बन गए होंगे | और जो आसूँ किसी के कोमल हाथों ने थाम लिए होंगे | वो भाप बनकर उड़ गए होंगे | और बरसे होंगे बूंदे बन कर | और फिर इसतरह रेत के कण और बूंद आपस में मिल गए होंगे | आखों  की झील में रहे या समन्दर की गहराई  में  | प्रेम कभी मरता नहीं | आसूँ बनकर गिरता है | भाप बन कर उड़ता है | रेत बनकर खामोश हो जाता है, तो बूंद की शक्ल में लहरों का रूप लेकर चंचल हो उठता है | 
ना जाने कितनी पीडाएं दुख से रेत बन कर खामोश हो गयी या कितनी बूंदों के रूप में   चंचल हो गयी | कौन करे हिसाब...,इस धरती पर  रेत के कण ज्यादा है या बूंदे ? रोज रात के स्याह अंधेरों में,कितनी बूंदें  कठोर रेत बन गयी |  या प्रेम का स्पर्श पाकर कितने  रेत के कण तरल हो के बूंद  बन कर बहने लगे | कौन जाने ? 
एक दिन एक बूंद ने , एक रेत के कण से कहा --बोलो क्या तुम पूर्ण हो ? मेरे बिना | रेत बोली ज्ञानी कहते हैं की हम सभी पूर्ण है | लेकिन तुम बिन मुझे अपूर्ण क्यों लगता है सब  ? मैं जहाँ जाती हूँ तुम्हे खोज लेती हूँ | बूंद कह उठी ,ना ...तुम बिन मैं कैसे पूर्ण हो सकती हूँ | हम एक जैसी ही है | तुझसे कैसा अपनापा है मेरा | अपने दुख को हमने अपनी चमक बनाया है | तुम मुझे इसी लिए  लुभाती हो | हम अपनी अपनी पीडाओं को खुद में समेटे हुए है |कितनी भी दूरियाँ हो हम मिल ही जाते हैं कहीं ना कहीं | क्या तुम्हारे आसुओं का खारापन मेरे खरेपन  से ज्यादा  है ?  बोलो ना ? कौन जाने.... किसके आसूँ कितने खारे ? हम दोनों कैसे जाने की किसके आसुओं में नमक  ज्यादा है ? अबकी बार रेत के कण को बूंद ने अपने हाथों में थाम लिया प्यार से और बूंद की आखों से आसूँ टपकने लगे | टप-टप -टप ....    जैसे जेल तोड़ के बहुत से कैदी  भाग रहे हो | रेत के होठों पर,  बूंदों का खारापन चिपक गया था | बूंद के खारेपन को चखने के बाद रेत  बोली ---बहुत पीड़ा है तुम्हारे भीतर .....बड़ी मासूमियत से बूंद बोल पड़ी | मैंने भी तो तुम्हे  छुआ है तुम्हारा खरापन मेरे खारेपन से ज्यादा बड़ा है | तुम्हारा खरापन , ही मुझे लुभाता है | तेरा मुझसे है पहले का नाता कोई .....

5 comments:

kavya sansar ने कहा…

bahut gahrai hai apke lekhan me.dil ko chhune vali. shabdon me vyakt yah dard hi to kisi lekhak, kav ya kahen kalamkar ki atma hoti hai.

29 जून 2012 को 3:07 pm
taruna ने कहा…

बहुत खूबसूरत लिखा है .एकदम अनोखी दृष्टि और दृष्टिकोण से लिखा गया है ...खरापन और खारापन - रेत और बूँद -दोनों का रिश्ता ऐसा कि एक दूसरे बिना अधूरे और अर्थहीन ...मानव मन भी यूँ ही कहीं पूरापन और सार्थकता तलाशता फिरता है पर जैसे हर रेत को बूँद का मोती नसीब नहीं ना हर बूँद को रेत के खारेपन की सार्थकता वैसे ही हर मन को भी ना खरापन नसीब होता है ना खारापन ...यानि सम्पूर्णता और अपने अधूरेपन के साथ मन बस यूँ ही भटकता रहता है ...कभी बूँद बन के रेत के कण को सीपी का मोती बनाने को कातर तो कभी रेत बन बूँद के आंसू पीने को व्याकुल .

29 जून 2012 को 6:20 pm
आधारशिला ने कहा…

मैंने भी तो तुम्हे छुआ है तुम्हारा खरापन मेरे खारेपन से ज्यादा बड़ा है | तुम्हारा खरापन , ही मुझे लुभाता है | तेरा मुझसे है पहले का नाता कोई .....

29 जून 2012 को 8:04 pm
Vandana ने कहा…

Taru se bahut taarif suni thi ....padhker dil khush ho gaya...aap bahut bahut accha likhti hain... badhai!

10 जुलाई 2012 को 2:16 pm
Unknown ने कहा…

hamesha ki tarah sundar likha hai

15 जुलाई 2012 को 5:35 pm

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