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अकल के परदे पीछे कर दे

मंगलवार, अगस्त 20 By मनवा , In

मारीशस की  धरती पर डोडो नामक बड़े पक्षी की प्रजाति निवास करती थी।  तीन फीट लम्बे 10 से 18 किग्रा के ये पक्षी बहुत भले थे और इंसानों के बहुत करीब आने की और करीब ही रहने की चाहत रखते थे।  दोस्ताना रखना उनका स्वभाव था। लेकिन इंसान ने डोडो को कभी नहीं समझा।  जब इंसान इस टापू पर पहुंचा और उसने 64 साल में ही डोडो को दुर्लभ होने के कगार पर पहुंचा दिया।  16 वी और 17 वीं सदी के बीच डोडो का नामोनिशान मिट चुका था।  इंसान की निर्ममता देखिये कि उसने उस भोले पक्षी का नाम "डोडो " यानी भोंदू रख दिया।
जब ये न उड़ सकने वाला डोडो इस दुनिया से हमेशा के लिए चला गया तब भी अकलमंद इन्सान को कोई फर्क नहीं पड़ा लेकिन एक विशेष बात हो गयी।  उस दिन से एक ख़ास प्रजाति के पेड़ों ने उगना कम कर दिया या लगभग बंद कर दिया।
ईश्वर ने उसे उड़ने के लिए नहीं, इंसानों के करीब रहने के लिए ही बनाया था और वो  इंसानों का प्रेम पाने के लिए ही  धरती पर आया था. लेकिन हमारी अकलमंदी , बेरुखी और अनदेखी से डोडो की सम्पूर्ण प्रजाति नष्ट हो गयी। लेकिन उसके विरह में एक ख़ास जाती के पेड़ों ने अपना जीवन नष्ट कर लिया। 
बात पहली नजर में साधारण सी लगती है लेकिन इसमे गहरा दर्शन छिपा हुआ है. और कुछ चुभते सवाल भी।
 इस पूरे ब्रम्हांड की हर छोटी -बड़ी चीज एक दूसरे से कनेक्ट है , गहरे में जुडी हुई है।  बाहर से अलग-अलग सी दिखने वाली चीज़े  भीतर से कहीं बहुत महीन तारों से जुडी होती हैं।  छोटी सी सामान्य सी, साधारण सी  चीज भी उस असाधारण से जुडी है।  , उस परम सत्ता का अंश है,हम सभी एक -दूसरे से जुड़े हुए हैं।    हम सभी ये बात जानते हैं , यकीन भी करते हैं 
हम सभी इस पर्यावरण के महत्वपूर्ण हिस्से हैं और एक छोटी सी तितली के पंख फड़-फडाने  से कहीं बहुत दूर किसी देश में बारिश होती है। कौनसी बूंद किस रेत  के कण से जुडी हैं कौनसी कली कब किसके लिए चट्केगी कौन जाने।  कौन किसका हिस्सा है, कौन किस कारन से जुड़ता है कौन किस कारन से बिखरता है , किस कारन से मिटता है कौन जाने।  कोई नहीं।  फिर हम कैसे अपने साथ घटने वाली किसी भी घटना को नकार सकते हैं या सिरे से खारिज कर देते हैं।  उससे भागने लगते हैं।  बचने की कोशिश करने लगते हैं। हर छोटी से छोटी  घटना अपने साथ वजह लेके जन्मती है।  हमारा कोई बस नहीं इसपर। फिर हम क्यों अनदेखी करते है , क्यों सहज नहीं रहते।  और जो सहज होते हैं. सरल और निर्मल उन्हें हम डोडो या भौंदू समझ लेते हैं।  

क्या प्रेमिल हो जाना , प्रेमी बन जाना , दोस्ती का हाथ बढ़ा देना या किसी के करीब रहने की , संग की साथ की आकांशा करना डोडो हो जाना है ? यानी भोंदूपन की निशानी है ? 
एक फिल्म में एक लड़की है जो घर की  मालकीन है।  घर का नौकर उसे जान की हद तक प्रेम करता है।  लड़की सारी फिल्म में उसे भोंदू ही समझती है , अनदेखा करती है और कहती है " दुनिया थूकेगी मुझ पर जो तुझसे प्यार किया तो " 
लड़का एक दिन  लड़की की ख़ुशी के लिए जान देने को तैयार हो जाता है लेकिन वो कहता है " तुम खुद को कहीं की अप्सरा मत समझना , तुम कोई विशेष नहीं हो , तुम्हे प्यार  करता हूँ ये मेरा टेलेंट है।  तुम्हारी  जगह कोई और होती तब भी मैं इसी शिद्दत के साथ प्यार करता " 
क्या किसी को प्रेम करना हमारा टेलेंट है ? हमारा हुनर है ? क्यों कर बैठते है हम प्रेम किसी एक से ? क्या खोजते है उसमे ? उसे या खुद को ? क्या वो दुनिया में सबसे खूबसूरत है इसलिए ? प्रसिद्द है इसलिए ? कोई विशेष गुण के कारन ? कोई  ख़ास हुनर की वजह से ? या हमने ही उसे पूज- पूज के देवता बना दिया।  किसी  घाट के गोल पत्थर को शालिग्राम कह दिया। 
क्या मनोविज्ञान है खुद ही प्रेम करते जाने का ? 
प्रेम करना हमारा स्वभाव होता है।  आत्मा की अतल गहराइयों में कहीं बहुत  गहरे में सोता होगा प्रेम , ना जाने कब से कितनी सदियों से लेकिन कोई उसे अपनी नन्हीं  छुअन से जगा जाता है।  तो झरना फूट  पड़ता है।  कोई आपकी उंगली पकड़ कर आपको आत्मा के भीतर बहुत गहरे में लिए जाता है।  प्रेम नगर की सैर कराता है. आप दूसरे के माध्यम से खुद को खोजने चल पड़ते हो।  गोया वो टार्च जलाता है और हम अपने बिखरे सामान समेटते हैं।  जैसे यादें , सपने , अहसास इत्यादि। वो यक़ीनन ख़ास होता है लेकिन हम उसे "सबसे खास " बना देते हैं क्योकिं उसने हमें बहुत गहरे में छुआ है इसलिए।  

ओशो कहते हैं सिर्फ देह से जुड़कर तुम कई चीजे चूक जाते हो, कुछ महान…कुछ रहस्यात्मक… क्योकिं तुम्हारी गहराई के बारे में तुम्हे पता ही नहीं होता तुम सिर्फ सतह पर जुड़ते हो , और दूसरे  को भूल भी जाते हो। लेकिन जब कोई तुम्हारी आत्मा को छूता है तो तुम्हे खुद की गहराई पता चलती है।  किसी दूसरे के द्वारा ही तुम अपने को जानते हो. अंतस में सचेत होते हो. गहन सम्बन्ध में ही , किसी के प्रेम में ही तुम खुद को खोज पाते हो। उस छुअन को तुम सदियों तक याद रखते हो।  हर प्रेम अनोखा है , उसकी प्यास अनोखी , उसके अंदाज अनोखे , उसकी खोज अनोखी है।  हम सब अपनी खोज में चलते जाते हैं दूर कहीं बहुत दूर………. 
इसलिए , हम खुद के लिए ही प्रेम करते है। खुद को खोजने के लिए।  किसी को प्रेम करना हमारे हिस्से का प्रेम है।  हमारा हिस्सा है और हमारा ही किस्सा भी। हमारी प्यास और हमारे अंदाज भी। इसमे इर्ष्या , उम्मीद और पाने की बात ही नहीं। 
तो अब सवाल ये कि इस तरह से बेशर्त प्रेम करना क्या डोडो यानी भोंदू हो जाना है ? 
कतई नहीं , हम हमारे प्रेम के गोंद  से रिश्तों को चिपकाते हैं हमारे लिये।अपनी मर्जी से , हम लोगों को पसंद करते हैं।  प्यार करते हैं , ईमानदारी  से कोई मिलावट नहीं इसमें। 
अब आखरी सवाल कि , जब सभी अपने प्रेम की खोज में हैं या खुद की खोज में हैं सभी को तलाश है ,दरकार  है तो फिर हर चेहरा क्यों उदास है ? क्यों प्यासे हैं लोग ? जबकि सागर भी आसपास है।  फिर महसूस क्यों नहीं कर पाते प्रेम को।  उसके आनन्द को , उर्जा को , शक्ति को ? 
दरअसल हमने अपने ज्ञान का बुद्धि का बहुत विकास कर लिया है हम बहुत अकल्मन्द हो गए  हैं इसलिए छोटी बातों  में अपना कीमती समय बर्बाद करना नहीं चाहते। किसी ने क्या खूब कहा है "अक्ल के मदरसे से उठ , इश्क के मदरसे में आ " 
लेकिन हमारे अहम् ,अभिमान के कद बहुत बड़े हैं वहां से प्रेम , दोस्ती जैसी चीजे  बहुत छोटी दिखती हैं।  हमने अपनी अकल  पे परदे भी लगा रख्खे हैं. ताकि वो सुरक्षित रहे कोई छोटी चीज उसे आकर नष्ट नहीं कर दे। हम जानते है जिस दिन भी किसी दरार से या "की-होल " से प्रेम झांक गया , उसी दिन हमारी सारी  अक्ल , सारी अकड़ धरी की धरी रह  जायेगी। सारे ठाट-बाट फीके पड़ जायेगे।  इसलिए हमने अक्ल पर मोटे -मोटे परदे डाल दिए।  अपनी आखं , नाक, कान  सब पर्दों में छिपा कर रखते हैं। कोई हवा कोई प्रेम-सन्देश न ले आये इसलिए आखं बंद। कोई प्रेम पुकार  हमें विचलित न कर दे इसलिए कान बंद।  कोई फूल न महक जाये इसलिए नाक बंद , कोई सांस हमारे दिल को ना धड़का जाए , इसलिए जिरहबख्तर पहन लेते हैं हम।  
अब इतनी चौकसी , इतने पहरे ,इतने परदों के बाद , इतने घूँघट के बाद कोई डोडो , कोई भौंदू की क्या मजाल कि वो तनिक भी ठहर पाए।  वो तो आखों में आसूं लिए , होठों पे बेबसी की मुस्कान लिए चुपचाप एक दिन चला जायेगा ही। 
कभी -कभी सोचती हूँ , जिस तरह से प्रेम के प्रतीक पक्षी , पेड़ और कई जीव जिनमे अब मधुमक्खियों की बारी है , नष्ट हो रहे हैं , रूठ के जा रहे हैं बिना कुछ कहे, इनके पलायन करने का कारन विज्ञान आजतक नहीं खोज पाया और न वो इन घटनाओं इन नातों और संबंधों को ही समझ पाया। 
 इसलिए वो सहज स्वीकार नहीं करता।  लेकिन एक दिन जब उसकी खोज पूरी होगी उस दिन जरुर स्वीकार  करना होगा लेकिन तब तक इंसान कितना नुकसान कर चुके होंगे इस धरती का ,प्रेम का, इस नुक्सान की भरपाई कौन  कर सकेगा ? , कहीं ऐसा न हो कि एक दिन   बिना कुछ कहे , ख़ामोशी से ऐसे ही किसी दिन  हमारी अकलमंदी , हमारी अनदेखी , हमारे अनमनेपन , बेरुखी से आहत होकर  …. प्रेम न चला जाये डोडो पक्षी की तरह दुखी होकर।  
शायद , इंसान को उस दिन भी कोई फर्क नहीं पड़ेगा ,प्रेम की करुण पुकार , उसका अलविदा कह जाना , कभी भी हम सुन ही नहीं सकेगे।  हमार्री अकल  के पर्दों पे अब कोई  हमें दस्तक सुनाई नहीं  देती है।  
लेकिन प्रेम के इस धरती से चले जाने के बाद फूल किसके लिए खिलेगे ? न कोई तितली उड़ेगी न आसमान में इंद्र-धनुष दिखेगा। न किसी पत्ती  पे कोई ओस से प्रेम-पत्र लिखा जायेगा।  
फिर किसी चट्टान पे कोई घास नहीं उगेगी न कोई लहर किनारों को आ -आ कर छुएगी।  
याद रहे , प्रेम बहुत स्वाभिमानी है और तुनक मिजाज भी।  वो खुद कभी अकल के परदे पीछे नहीं करता है न कभी घूँघट के पट खोलता है।  वो दरवाजे पे दस्तक बन के दम तोड़ सकता है लेकिन कभी कोई दरवाजा नहीं तोड़ता , वो परदों के घूँघट के बाहर सदियों तक इन्तजार कर सकता है लेकिन परदे नहीं खींचता।  जब हमने लगाएं हैं  ये  अहम्  और  अभिमान के परदें तो हटाने भी हमें ही होगे न , भला परदों के पीछे से कभी चाँद दिखता है क्या ? प्रेम छूता है क्या ? 

क्या कभी खुद से इश्क किया ?

शनिवार, मार्च 9 By मनवा , In

अक्सर लोग जब रिश्तों और सम्बन्धों पे चर्चा करते हैं तो खूब शिकायत करते हैं कि फलां व्यक्ति को उसने बहुत प्रेम किया ,उसके साथ  बहुत समय नष्ट किया ,मंहगे तोहफे दिए , कोई फायदा नहीं हुआ ,( गोया किसी फायदे के लिए प्रेम किया हो )या कि सब बेकार की बातें है कभी किसी से प्रेम नहीं करना चाहिए सब धोखे बाज होते हैं ...कोई किसी का नहीं आदि आदि कुछेक महिलायें खुद से ही प्रेम करने की सलाह देती दिखाई देती है की दुनिया के सभी पुरुष बहुत बुरे हैं इसलिए खुद से प्रेम करो और खुश रहो । तो कहीं पुरुष कहते हैं सभी महिलायें बहुत चालाक और फरेबी हैं उनसे बचो खुद में खुश रहो ....क्या सिर्फ खुद से प्रेम किया जा सकता है ? आत्मकेंद्रित या आत्ममुग्ध होकर भी आप क्या खुश रह पाते हैं ? सबसे ज्यादा कुंठित तो आत्ममुग्ध लोग ही होते हैं और एक दिन अपनी कुंठाओं में डूब जाते हैं । ये आत्ममुग्ध कभी किसी से प्रेम नहीं कर पाते खुद तो मरते ही हैं साथ ही प्रेम की हत्या भी करते हैं । मेरी एक  मित्र हैं उनसे जब मिली तो उन्होंने  बड़ी शान से मुझे कुछ तोहफे दिखाए जो उनके नए प्रेमी ने दिए थे और वो तोहफे भी भी दिखाए जो उन्होंने पिछले प्रेमी से वापस मांग लिए थे (रिश्ता टूटने के बाद ..) यानी  वस्तुओं के लेन - देन का रिश्ता हुआ  प्रेम कहाँ हुआ ? अगर प्रेम था तो वो खतम कैसे हो गया ? कोई आपके  बनाये सांचे में नहीं ढला तो खतम प्रेम ? कोई बिलकुल आपके जैसा नहीं हो सका तो रिश्ता खतम ? एक  और उदाहरण दूँ एक  पुरुष मित्र हैं जो अक्सर कहते हैं प्रेम तो कर ले लेकिन उससे क्या लाभ ? हम तो खुद से प्रेम करते है खुद के लिए जीते हैं मैंने पूछा  फिर इतने दुखी क्यों हो ? जब खुद से प्रेम है तो खुश रहो न , चेहरे पर मुस्कान क्यों नहीं ? आखों में से प्रेम क्यों नहीं झांकता ? हमेशा डरे हुए क्यों हो ? अशांत क्यों है मन , आनन्द   क्यों नहीं जीवन में , और वो प्रेम मदीरा की खुमारी कहाँ है ? वो मित्र चुप थे कोई जबाव नहीं था उनके पास ......जब खुद ही रीते हो अन्दर से तो दूसरे को क्या देंगे आप ? फिर लोग मंहगी वस्तुओं का लेन -देन करके प्रेम की कमी को पूरा करने लगते हैं । खुश होते हैं और वस्तुओं में प्रेम खोजने लगते हैं और कहते हैं देखो हम कितना प्रेम करते हैं एक दूजे से कोई किसी को कार या बंगला गिफ्ट करता है कोई किसी को हीरे -मोती लेकिन हीरा तो बना रहा ,सदा के लिए लेकिन प्रेम का अता पता नहीं ...
सच्ची बात तो ये है कि लोग जानते ही नहीं कि खुद से प्रेम करने का क्या मतलब है । खुद से प्रेम करना यानी खुद को समझ लेना , खुद को जान लेना , खुद को बतला देना कि मुझे ये पसंद है । मुझे इसकी चाह है और मैं इसे चाह कर खुश हूँ । हम जब किसी को दुःख देते हैं तो उससे ज्यादा खुद दुखी होते हैं  इसके उलट हम जब किसी को प्रेम करते हैं तो उससे ज्यादा खुद सुखी होते हैं । हम प्रेम अपने लिए करते हैं , हमें कोई पसंद है हमें कोई भाता है , हम किसी को सोचते हैं , याद करते हैं और खुश हो लेते है ।  हमने प्रेम कर लिया तो कर लिया बात खतम हुई  न ,    ये हमारा प्रेम है सम्पूर्ण रूप से । 
अब दूसरा करे न करे , प्रतिदान दे न दे ये उसकी समस्या है हमारी नहीं , हमारे मन को ख़ुशी मिली किसी को चाह कर , याद करके तो हम डूबेंगे आनन्द में दूसरा न डूबे तो ये उसकी समस्या है । प्रेम हमारे मन में खिला , चन्दन  हमारे  मन में महका आप उसे महसूस करिए न , आप सुगंध से भर जाए ना की इस चिंता में कुंठित हो जाए कि वो अभी कहाँ होगा , किसके साथ होगा , मुझे याद करता है या नहीं प्यार करता भी है या  नहीं ..इन बेकार के सवालों के कोई जवाब नहीं मिलते कभी । उलटे आपके रिश्ते खराब होते हैं , प्रेम को समझने से पहले खुद को समझना होगा हम क्या चाहते है ? 
हाँ , प्रेम एक व्यक्ति करता है दूसरा तो उसकी चमक से चमकता है बस ,,,,,चम्पा कहीं ओर खिलती है लेकिन उसकी खुशबु से कहीं  दूर बहुत दूर कोई बौराता है । प्रेम के अपने  रहस्य हैं ये , शक्ति है ये प्रेम की ,इसे समझना होगा । हम जब खुद को प्रेम से भर लेते हैं तो हम प्रेम-पुंज हो जाते हैं , प्रेम के चुम्बक भी  ... , निस्वार्थ भाव से जब सांसों की माला पे किसी का नाम सिमरा जाता है तो , इस हौले-हौले चलने वाले मनकों  की गति से दूर बहुत दूर कोई चिड़िया पंख फड़ फडाने  लगती होगी यक़ीनन ये सब खुद से प्रेम के नतीजे हैं । 
हमें अपने भीतर जो सबसे अच्छा गुण लगता है हमें उस गुण से प्रेम करना चाहिए । यदि आपको लोगों से प्रेम से बातें करना पसंद हैं , उनकी मदद करना या उनके दुःख दर्द  सुनना  तो गर्व कीजिये अपने इस गुण पर , अपने किये पर कभी अफ़सोस मत कीजिये । हमारे पास जो था हमने दे दिया , कोई नहीं लौटाए तो ये उसकी समस्या है आपकी नहीं । हमें हमारा प्रेम कलश हमेशा भरे रखना चाहिए ,जब भर जाये तो उसे मुस्काते हुए छलकाना होगा । आइने में खुद को देख मुस्काना सीखना होगा । 
याद रहे , जब तक खुद के प्रति प्रेम से नहीं भरेगे दूसरों से कभी प्रेम नहीं कर सकेगे । भीतर बहुत भीतर से झरने फूटेंगे तभी बाहर हरियाली होगी । शुरुआत बूंद जैसी छोटी ही क्यों न हो , लेकिन हो तो सही ..ये भी चलेगा । 
यहाँ ओशो की कही बहुत सुन्दर बात साझा कर रही हूँ वो कहते हैं "अमेजन दुनिया की सबसे बड़ी नदी है लेकिन जहां से वह निकलती है वहां एक -एक बूंद टपकती है। दो बूंदों के बीच बीस सेकंड का फासला होता है ,लेकिन वह एक -एक बूंद गिर -गिर कर अमेजन जैसी विशाल नदी बन जाती है , इतनी विशाल की सागर में जब समाने जाती है तो सागर भी  हैरान हो जाता होगा उसे देख कर की ये नदी है या सागर ? " 
सच तो है , प्रेम भी तो ऐसे ही शुरू होता है बूंद -बूंद से और कैसे गहरा हो जाता है सागर सा ...व्यक्ति व्यक्ति से और एक दिन हम "समस्त " से प्रेम करने लगते हैं । प्रेम इतना अनंत है कि एक व्यक्ति उसे सम्भाल ही नहीं  सकता घबरा जाता है , भय खाने  लगता है , डूब जाता है और प्रेम उसे डूबा कर फिर आगे बढ़ जाता है वो अब प्रार्थना   बन जाता है । प्रेम कभी किसी एक व्यक्ति पर नहीं टिकता वो फैलता है , मरता नहीं लेकिन अपने रूप बदलता रहता है । जो प्रेम कर रहा है वो रहे न रहे , जिसे प्रेम किया जा रहा है वो रहे न रहे लेकिन प्रेम फिर भी रहता है हमेशा ..हर हाल में । हमारी कोशिश होनी चाहिए कि प्रेम बना रहे , एक बहुत सुन्दर कहानी आपको  बताती हूँ । 

बुद्ध का अंतिम दिन था , जिस दिन वे भोजन करने इक बहुत गरीब लुहार के यहाँ गए, लुहार अत्यंत गरीब था उसके पास बुद्ध को खिलाने के लिए कुछ नहीं था बरसात में लकड़ियों पर उगने वाली  छतरी नुमा  कुकरमुत्ते की सब्जी बड़े प्रेम से बना लाया । जहर से ज्यादा कड़वी सब्जी खाते रहे बुद्ध , वो  पूछता रहा कैसी लगी ? बुद्ध मुस्काये तो उसने और सब्जी थाली में  डाल दी ..उसका प्रेम देख बुद्ध मुस्काते थे और पूरी सब्जी खा गए । देह में जहर फ़ैल गया चिकित्सक बोले आप जानते थे सब फिर भी उस लुहार को रोका क्यों नहीं ?  बुद्ध  मुस्काये और बोले -मौत तो एक दिन आनी ही थी , मौत के लिए प्रेम को कैसे रोक देता ? मैंने प्रेम को आने दिया -प्रेम को होने दिया मौत को स्वीकार किया , हानि कुछ ज्यादा नहीं -कल परसों में मरना ही  था लेकिन प्रेम की कीमत पर जीवन को कैसे नहीं बचा सकता हूँ । 
ऐसा ही होता है प्रेम ,आप प्रेमवश होकर जहर पी जाते हैं , खुद दुःख उठाते हैं लेकिन प्रेम को होने देते हैं । प्रेम को खोजने आपको कहीं जाने की जरुरत नहीं होती आपको खुद के भीतर झांकना होता है । हम सभी के भीतर हमेशा प्रेम कलश भरा होता है । उसे बस प्रेम से छूने की देर होती है वो छलकने लगता है । जब भी कोई प्रेम से पुकारता है , मन को छूता है हमारा प्रेम कलश भर -भर जाता है लेकिन अक्सर हम उस कलश के ऊपर भय,शंकाओं पूर्वाग्रहों और संदेहों के ताले जड़ देते हैं । जैसे उन्मुक्त झरने के ऊपर भारी पत्थर रख दिया हो ..लेकिन भीतर बहुत भीतर फिर भी प्रेम बहता है चुप -चुप से । उसे बहने दीजिये , ऊपर आने दीजिये रोकिए मत .., टोकिए मत ..छलकने दीजिये उसे , बना रहे प्रेम जीवित रहे हर हाल में , लेकिन पहली शर्त है खुद से हो प्रेम , खुद से हो इश्क , खुद को प्रेम से भर लीजिये फिर दूसरे से प्रेम कीजिये । क्या कभी खुद से इश्क किया ?