प्रेम रसायन हमरे पासा ....
मेरे घर के सामने काफी दिनों से , एक मकान बन रहा है । रेत , गिट्टी और पत्थरों के ढेर लगे होते हैं । आसपास के बहुत से बच्चे अक्सर शाम को रेत के ढेर पर खेलने आते हैं । उस दिन मैंने देखा , सभी बच्चे , रेत में से गोल -गोल सुन्दर , चिकने पत्थर छांट रहे थे । कुछ देर पहले ही खाली हाथ आये ये बच्चे अब उन पत्थरों के मालिक थे । सभी ने अपनी -अपनी पसंद के पत्थर चुने और खेलने लगे । इक पल में वो पत्थर उनकी सबसे प्रिय चीज हो गए थे । कोई भी बच्चा किसी दूसरे साथी को अपने पत्थर ना देने को तैयार था । ना बदलने को ही ,,,,बेजान , अनजान से पत्थरों और उन अबोध बच्चों के बीच कैसा अनजाना रिश्ता बन गया था ।
बच्चे उन पत्थरों के प्रेम में ऐसे पड़ गए की , लड़ने , झगड़ने पर उतारू हो गए क्यों ?
अक्सर घर की टूटी फूटी चीजों में ही बच्चों का दिल क्यों बसता है ? किसी भी सही सलामत चीज को वो जरुर तोड़ेगा ., जोड़ेगा और फिर तोड़ेगा ...क्यों करता है वो ऐसा ?
बच्चे , बहुत ही पवित्र , निच्छल और भोले होते हैं । वो हर उस चीज के प्रति संवेदन शील हो उठते है , जो उन्हें लुभाती है । ये संवेदनशीलता ही ,उन्हें बेजान वस्तुओं से भी प्रेम करना सिखाती है । ये बच्चे जब हमारी तरह बड़े और समझदार (?) हो जायेगे तब तक इनकी संवेदनशीलता अपने स्वार्थ , अपने हित , लोभ लालच और अवसरवादिता के परदों में छिप जाएगी । फिर ये बेजान वस्तु तो क्या , जीवित लोगो के प्रति भी संवेदनशील नहीं रह सकेगे । प्रेम नहीं कर सकेगे । प्रेम रसायन सूख जायेगा ।
कभी -कभी सोचती हूँ । ये प्रेम रसायन हम सभी के भीतर बहता है ,लेकिन हम सभी इससे इतने अनजान क्यों रहते हैं ? जड़ में , चेतन में .....रेत में , बूंदों में , किनारों पे , तो लहरों में , वृक्षों में , मिटटी में ..और ये सभी इस रसायन को अपनी -अपनी तरह से अभिव्यक्त भी करते हैं ।
पत्थरों में भी प्रेम रसायन बहता है , वो बोलते नहीं तो क्या हुआ , जरा प्रेम से छू कर देखिए अगले ही पल वो आपसे बात करने लगते हैं, हमसे । प्रेम रसायन शब्दों का मोहताज नहीं , उसके पास बोल नहीं, लेकिन इसका ये मतलब नहीं की उसका कोई मोल नहीं । इस रसायन को महसूसने के लिए हमें सबसे पहले संवेदनशील होना होगा । सबसे पहले खुद के प्रति । स्वयं को सबसे पहले हमें छूना होगा । खुद को जब हम महसूस करने लगते हैं ना , फिर हमें दूसरों को महसूस कर पाने की कला आती है । और फिर इक दिन हम अपने आसपास की सभी जड़, चेतन वस्तुओं को महसूस करने लगते हैं । उनसे बात करने लगते हैं । हम जब किसी के प्रति संवेदनशील हो उठते हैं तो खुद को पूरी तरह भुला देते हैं । ठीक उसी पल वो चीज , या व्यक्ति आपके प्रेम रसायनकी वजह से आपको महसूस होने लगता है ।
जैसे - जैसे हम ज्यादा संवेदनशील होते जाते हैं , हमारी दुनिया बदल जाती है । किसी दूसरे के दर्द को आप अपने भीतर महसूस कर पातें हैं । दिनभर हंसने -हंसाने वाले के रुदन को सुन पाते हैं । हमेशा मौन रहने वाले की बात सुन पाते हैं । वृक्ष पर लिपटी लता , साहिल से सटकर बहते दरिया , मिटटी की सोंधी खुशबु और पत्तों पर जमी शबनम की बूंद का विज्ञान समझ आने लगता है । इक दूसरी दुनिया में , विचरते है हम ...और जो इस रसायन को हम महसूस नहीं कर पाते तो हम संवेदन शून्य हो जाते हैं। प्रेम रसायन के सूख जाने पर , जहरीले रसायन बनते हैं । ये जहरीले रसायन खुद के मन की धरती को तो बंजर बनाते ही हैं , दूसरो के टुकड़ों को भी बंजर कर देते हैं न जाने मन के कितने हिस्से बंजर किये इन रसायनों ने , ये ही है जिन्होंने न जाने कितनी स्त्रियों को पत्थर बनाया । ये हमें इतना बदसूरत कर देते हैं ,कि सुन्दर से सुन्दर चीज भी हमें सुन्दर महसूस नहीं होती । प्रेम हमें भिगोता है लेकिन फिर भी हम सूखे ही रह जाते हैं । होली के रंग फीके और दिवाली के दिए बेरौनक दिखते हैं ।
मनोविज्ञान , चाहे जो कहे की मनुष्य का व्यवहार बहुत से रसायन मिल कर तय करते हैं ।लेकिन मैं सोचती हूँ .कि सदियों -सदियों से इस सारी दुनिया को सिर्फ इक ही रसायन ने थामे रखा है ।और वो है प्रेम रसायन , ये कभी नष्ट नहीं होता । ये शाश्वत है । यही है जो आसमान को झुकाता है । धरती को महकाता है । कहीं पहाड़ तो कहीं वृक्ष बन जाता है । कहीं बूंद बन कर बहता है , कहीं रेत बन कर सिमटता है । कहीं गीत बन कर सजा कहीं साज बन कर बज उठा । कहीं रीत कहीं प्रीत कही हार कहीं जीत बन कर ढलता रहा है , ढलता रहेगा । कृष्ण की बांसुरी ने कभी किसी को आवाज देकर नहीं पुकारा , लेकिन यकीनन उस बांसुरी में ये रसायन सुर बन कर ढला होगा । राम के पवित्र पैरों से कोई, पत्थर स्त्री क्या यूँ ही बन गया होगा ? शिव की जटा पर गंगा किस रसायन की वजह से थमी होगी ?
दिखता नहीं पर , यक़ीनन महसूस होता है । नसों में बहता है लहू बनकर । आसमानों से बरसता है , धडकनों में बसता है । दिलों में सिसकता है तो आखों से टपकता है । गालों पे चिपके तो खारा लगता है । होठों पे सजे तो मीठा सा .. इस प्रेम रसायन को महसूस किया जाये सबसे पहले स्वयं के भीतर और फिर सभी के भीतर ।
अब तक उन प्यारे बच्चों का खेल समाप्त हो चुका था । अपनी छोटे -छोटे हाथों में वो पत्थर लिए जा रहे थे । मैंने उनसे पूछा क्या है ,हाथ में ? वो हंस के बोले प्रेम रसायन हमरे पासा ....



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