बेनाम सा ये दर्द ठहर क्यों नहीं जाता
दोस्तों , पिछली बार मनवा में बसंत- बहार ,फूलों , खुशबू-और प्रेम की बात हम कर रहे थे और मैं सचमुच आँखें मूंद के उस अहसास को महसूस कर रही थी की ज्यों ही आँखें खोली बसंत गायब , बहारें नदारद ,फूल भी नहीं और खुशबू का भी अता पता नहीं जहाँ देखो वहाँ पीले पत्ते और कुम्हलाये फूल बिखरे हुए थे हरे भरे पेड़ बिना पत्तों के डरावने ठूंठ में तब्दील हो चुके थे
मैं समझ गयी की पतझड़ आ चुका है कैसे कुछ पलों में प्रकृती ने सब कुछ बदल दिया जिस तरह हरे भरे वृक्ष ठूंठ में , बहारें पतझड़ में हरियाली सूखे में बदल गयी
दोस्तों , कुछ ऐसा ही तो हमारे मन के साथ भी होता है है ना कभी बसंत कभी पतझड़ , मन की बगिया में रूह के वृक्षों से लिपटी अहसास की लताएँ कैसे इक झटके में सूख कर नीचे गिर जाती है और सालों से वृक्षों से सटे पत्ते { जिन्हें आंधी तूफ़ान नहीं गिरा पाते } वो पतझड़ में इक हवा के झोकें से कैसे धरती पर आ गिरते हैं ? ठीक इसी तरह दोस्तों जब हमारे जीवन में पतझड़ शुरू होता है तो बरसों बरस ,जन्म जन्मान्तरों के रिश्ते इक ज़रा सी बात पे टूट जाते है , इस मौसम के बिछड़े फिर कभी नहीं मिलते वो पत्ते और फूल वो अहसास और भाव जो इक बार चले जाते हैं वो वापस कभी नहीं लौटते वक्त की आंधी उन्हें दूर देश उड़ा कर ले जाती है और जो मन बसंत में अहसासों के फूलों से महका महका रहता था अब वो महकता नहीं दर्द से दहकता है
दोस्तों ,पतझड़ बसंत या सुख और दुःख या संयोग और वियोग हमारे जीवन का हिस्सा है लेकिन जिस तरह धरती इस परिवर्तन को सहर्ष स्वीकार कर लेती है मन की धरती ऐसा क्यों नहीकर पाती ? बसंत की मधुर यादें जहाँ हमें जीवित होने का अहसास कराती है पतझड़ का बेनाम सा दर्द हमें पल पल मारता है इस दर्द की कोई व्याख्या नहीं ये गुजर कर भी नहीं गुजरता यादों के वियाबानों में जब स्याह रातों में हम जब तनहा होते हैं ये बेनाम सा दर्द और गहराता जाता है हम जब दर्द के समन्दरों में डूबने लगते हैं और लहरोंके शोर में हमारी आवाज हमारी आह कोई नहीं सुनता ये दर्द बीत जाने पर भी गुजर नहीं पाता,न जाने क्यों मुझे हमेशा से ही लगता है की दर्द के समन्दरों का पानी आसुंओं की वजह से ही खारा है हमारे प्रेम अहसास और भावों की नदी जरुर उस समन्दर में जाकर मिलती है लेकिन दर्द के सागर में जाकर खारी हो जाती है बेनाम दर्द जो आंसूं हमें देता है दुनिया उसे पानी ही समझती है लेकिन मैं उसे आग कहती हूँ मन की चिता को ये आसूं कभी बुझा नहीं पाते ये आसूं बहुत गर्म होते हैं कभी छू कर देखना ये बरसते तो हैं सावन की तरह लेकिन इस पतझड़ के सूखे को हरा नहीं कर पाते और ये बेनाम सा दर्द कभी नहीं ठहरता मीलों , सदियों तक यूँ ही चलता रहता है किसी ने क्या खूब कहा है बेनाम सा ये दर्द ठहर क्यों नहीं जाता जो बीत गया है वो गुजर क्यों नहीं जाता





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