jindgi लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
jindgi लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

जिन्दगी से कोई वादा तो नहीं था ...........

बुधवार, अगस्त 24 By मनवा , In

कल रात के स्याह सन्नाटों में , जब पलकों ने मूंदने से इनकार कर दिया | आखें इक-टक शून्य में निहारने लगी | तो नींद समझ गयी की , आज मेरा यहाँ कोई काम  नहीं और वो चुपके से वहाँ से चली गयी |आसपास कोई था भी  नहीं | और मीलों तक ख़ामोशी अपने होंने पर इतरा रही थी | तभी किसी के कोमल स्पर्श ने मुझे छुआ | और कहा | सुनो , अगर इन आखों से बहते झरने को कुछ देर रोक लों तो मैं तुमसे दो पल बात कर लूँ ?


मैंने कहा कौन हो तुम ? मैंने तो किसी को आवाज नहीं दी | तुम फिर कैसे चली आई ? मुझे किसी से कोई बात नहीं करनी  और  तुम तो दिखती भी नहीं मुझे क्यों ? 


वो बोली मैं तुम्हारी अपनी ही हूँ | तुम्हारी जिन्दगी | "अपनी " शब्द सुनकर मुझे जोर से हंसी आ गयी | और मैं उठकर जाने लगी | उसने रोका -ज़रा ठहरों | तुम मेरे बिना कैसे जा सकती हो ? कैसे जी सकती हो ? कैसे चल सकती हो ? मैं फिर हँसने लगी हाँ मैं तुम्हारे बिना भी जी लेती हूँ | हंस लेती हूँ | जी लेती हूँ | अगर सांसों का आना जाना  ही  जिन्दगी है| तो ये काम बखूबी हो रहा है | अब तुम जाओ |वो बड़ी मनुहार के साथ कहने लगी |देखो तुमने कभी किसी मोड़ पर मुझसे वादा किया था की तुम मेरा साथ निभाओगी | नहीं मैंने ऐसा कोई वादा नहीं किया | लेकिन तुम बिन जीने का इरादा भी नहीं  था मेरा |लेकिन तुम जो कदम -कदम पर मुझे आजमाती हो | नये नए रूप धर के स्वांग रचती हो | इससे मैं थक गयी हूँ | अब तुम किसी भी भेष में आओ मैं तुम्हे पहचान लेती हूँ |अब  क्या लेने आई हो मुझसे ?-चली जाओ|इस बात पर  उसने मेरे हाथ , अपने हाथों में भर लिए और प्यार से कहने लगी | तुम जिसे स्वांग कहती हो| वो मेरे रंग है | बहुत रंग बिरंगी हूँ मैं | जहाँ दर्द के स्याह रंग है | पीड़ा के धूसर रंग है | वहां प्रेम के लाल ,गुलाबी रंग भी तो मैंने तुम्हे दिए | ख़ुशी के आनंद के नीले पीले इन्द्रधनुष भूल गयी तुम ? मेरे साथ साथ चलो यूँ बेजार नहीं हुआ करते |


बोल चुकी  तुम ? अब मैं कुछ कहूँ ? देखो , जिन्दगी तुम्हारी इक इक अदा मेरी समझ से परे है | और तुम मुझे कभी रास नहीं आई | अभी पिछले दिनों  तुमने मुझे बुरी तरह तोड़ा था | बिखर -बिखर गयी मैं | अनगिनत टुकड़े हुए मेरे | दर्द के समन्दरों से खुद को निकाल कर मैंने इक -इक टुकड़ा खोजा | उन्हें उठा --उठा कर जोड़ती रही ......| लेकिन अफ़सोस कोई भी टूटा हुआ टुकड़ा किसी भी हिस्से  से मेल नहीं खा रहा | कोई किसी से नहीं मिलता | और ना फिर से जुड़ ही पाता है | अब मैं खुद को कही से जोड़ना नहीं चाहती तो फिर तुम मेरे सामने आ खड़ी हुई जोड़ने के लिए | 
खुद को बहुत होशियार समझती हो तुम | क्या यहाँ कोई " मुझे तोड़ो -मुझे जोड़ो " का खेल हो रहा है | जुड़ भी गया कोई हिस्सा तो उसमे दरार साफ नजर आती है जिन्दगी | जिसमे से दर्द रिस -रिस कर बहता रहता है ताउम्र | समझी तुम ?


क्यों करती हो तुम ऐसा | जब हर झील में पानी है | लहर है तो | कमल क्यों नहीं खिलते ? जब भी मैंने तुम्हारे अर्थ खोजे | बदले में सिर्फ बैचेनियाँ ही पाई | आईने में खुद को जब -जब भी देखा बस इक आवाज आई | क्यों हूँ मैं यहाँ ? किसके लिए ? और क्या अर्थ है मेरेहोने का ? इन डरावने सवालातों के जबाव  तो दो ? 


क्या मांग लिया तुमसे ? अपनी बाहें फैला कर सारे संसार को भरना चाहा  था उसमे | अपनी दो छोटी आखों में सबके लिए दर्द भर लिया था | और मन में प्रेम | अपनी उम्मीदों के पौधे लगाये | सपनों के बीज बोये | और तुमने मेरी क्यारियों को छोड़ सारे शहर में सावन बरसाए क्यों ? जब मैं दर्द से भर गयी और तुमसे कुछ कहना चाहा तो तुम्हारे पास समय नहीं था | आज मैं होठों पर चुप लगाये हूँ तो कहती हो बोलती क्यों नहीं ? 
जब मैं हंसती थी तो कहती थी | क्यों वेवजह हंसना ? आज जब आसूँ है तो फिर कहती हो क्यों ये झरने ? पहले कहती थी खाब बुनो यही जिन्दगी है | और जो खाब बुने तो नींद से जगाकर कह दिया जागो ये हकीकत नहीं | सुख दुख के तानेबाने पर मैंने रिश्तों के लिबास सिल लिएथे  जिन्दगी और तुमने उन रिश्तों में भी गांठ लगा दी | 


तुम बिन जीने का इरादा नहीं था जिन्दगी | पर मैं अब तुम बिन ही जीना चाहती हूँ | अब मुझे तुम्हारी जरुरत भी नहीं | इस बार जिन्दगी बड़ी मायूस होकर मेरे पास से चली गयी |जिन्दगी तुमसे कोई वादा नहीं था मेरा | हाँ लेकिन तेरे बिना जीने का अब इरादा है मेरा |  सुबह हो गयी | 
और मुझे याद आया| मेरे इक मित्र जो शायर है सूरज का इक शेर कि


"नींद क़ी बंदिशों में, आखं कहाँ जगती है 
जिन्दगी बर्फ है कभी , कभी सुलगती है |
बेबसी , मुफलिसी , गम , दर्द , जिल्लते, आसूं 
इतने कपड़ों में, भला ठण्ड कहाँ लगती है ||

जिन्दगी तेरी इक इक अदा जुर्म है-------------------------------

गुरुवार, दिसंबर 2 By मनवा , In

बहुत दिनों  बाद आज आप से फिर मुखातिब  हूँ  मनवा  के माध्यम से  दोस्तों ,कल अचानक तेज हवा के साथ  मेरे शहर में बरसात  हुई , और मिट्टी  की सौंधी खुशबूं के साथ इक   अहसास  मुझे छू कर गुजरा  मैंने पूछा कौन ? बोला  मैं जिन्दगी हूँ  मैंने कहा  बड़ी जल्दी में हो चंद सवालों के जवाब दे कर चली जाना  मैंने उससे पूछा कल पौधों के पत्तों पर ओंस की बूंदों में;  मैंने तुम्हे देखा था छूना चाहा तो तुम वहां नहीं थी फूलों की खुशबु में छिपी  मुझे तुम अगले मोड़ पर फिर मिल गयी लेकिन जैसे ही फूल को तोडा  तुम वहां से भी खिसक गयी   रात को दिए की बाती में झिलमिलाती हो तो अगले ही पल उसी लौ से हाथ जला  देती हो जब मैं  खुद को तुम्हारे सामने अभिव्यक्त  करना चाहती हूँ तो कहती हो कितना  बोलती हो तुम ? और जब मैंने होठोंपर " चुप " के ताले  लगा लिए तो शिकायत   करती हो की कुछ कहती क्यों नहीं ? जिन्दगी तुम ऐसी क्यों हो ? मैंने जब बेबसी के साथ सबकुछ सहन करना सीख लिया  तो कहती हो उठो हौसला  रखो और जब मैंने हौसले  के साथ बढ़ना चाहा तो साथ छोड़ गयी  तुम  क्यों ?जब किसी की साँसे दर्द से बोझिल होने लगी तो तुम ठंडी  हवा का झोकां बन किसी अजनबी के रूप में आ गयी और जैसे ही खुद को कोई संभाले आखें  खोले की तुम वहां  से गायब .जब  फसलों को रिमझिम फुहारों की प्रतीक्षा  थी तब तुम वहां कभी नहीं थी और जब धुप में पौधे झुलस गए तो सावन बन कर क्यों चली आई तुम ?तुम्हारे कितने अजब रंग है जिन्दगी पहले तो आखों से नींदे चुरा लेती हो और  यादों के वियावानों में भटकते हुए थक के नयन  जब खुदब- खुद बंद हो जाए तो उनमे सपने सजा देती हो जैसे ही मन सपने संजोने लगता है लम्हे बुनने लगता है  तुम इक  झटके में उसे नींद से जगा देती होऔर कहती हो ये तो सपना था हकीकत मैं हूँ  तुम ऐसा क्यों करती हो ? किसी की आँख  किसी के इन्तजार में ताउम्र रोती है और जब वो हमेशा के लिए बंद हो जाती है  तबतुम रोशनी बन वहां पहुंचती  हो लेकिन बहुत देर बाद  जिन्दगी तुम देर क्यों  कर  देती हो हमेशा ?जब दर्द से मन भर जाता है और पलकें आसुओं से तो तुम   कहती  हो  खबरदार जो रोई तो इक आसूं भी नहीं गिराना  और जब हम अपने पर अपने हालात पर खुद ही हँसने लगे तो कहती हो      चुप  रोने की बात पर भी कोई  हंसा जाता है जिन्दगी  तुम्हारी हर बात  निराली है किसी को याद कर लिया तो कहती हो ये  जुर्म  है और भुला देना चाहो  तो कहती हो और बड़ा  जुर्म  है  दुनिया की तरफ से बेखबर  हो जाओ  तो कहती हो दुनिया के रंग देखो और जब इस दुनिया के रंग में खुद को रंग देना चाहो तो कहती हो  हर तरह गौर से देखना  जुर्म है जिन्दगी वाकई तेरी हर इक अदा  मुझे जुर्म ही लगती है  बेबसी जुर्म है हौसला जुर्म है जिन्दगी तेरी इक इक अदा जुर्म है अरे  तुम कहाँ  गयी  फिर गायब ---------------