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तुम रो लो परदेश में , नहीं भीगेगा माँ का प्यार ---------------

बुधवार, मई 11 By मनवा , In

दोस्तों ," मदर्स डे " पर क्या लिखूं  क्या नहीं लिखूं यही सोचती  रही और मदर्स डे चला गया |   कौनसी माँ के बारे में लिखूं ?वो माँ जो इक पवित्र भावना  है | संवेदना  है | कोमल अहसास है | तपती दोपहरी में  मीठे पानी का झरना  है | इक खुशबु  है| वो माँ जो कभी मिटती नहीं |  देह  मिट भी जाये तो अपने बच्चों की देह में रूह बन कर सिमट जाती है| उनके लब पर दुआ तो कभी मन में अहसास बन कर ढल जाती है ऐसे लाखों शब्दों में ,मैं उसे व्यक्त करूँ भी तो वो अव्यक्त  ही रह जायेगी |
दोस्तों , मैं आज उस माँ  की बात   नहीं कर रही जो बेसन की रोटी पर खट्टी चटनी  जैसी  लगती थी | मैं उस माँ की बात भी नहीं कर रही जिसका  बेटा परदेश में रोता था तो देश में उसका प्यार भीग जाया करता था | मैं  मेक्सिम गोर्की की माँ  की बात भी नहीं कर रही और ना जीजा बाई की जिसने   इक बालक को शिवाजी  बना  दिया |
आज बात है , आज के दौर की ,आज की नारी की |आज की माँ की | आधुनिक भारतीय नारी की  | वो अब खुद गीले में सोकर अपने बच्चे को सूखे में सुलाने  की भूल नहीं करती | वो अब  अपने बच्चे को  खुद से दूर झूले में सुलाती है | नींद में खलल  नहीं पड़े  इसलिए दूध  की बोतल  चिपका दी जाती है | ये आधुनिक माताएं  अपने शौक के लिए पैसों  के लिए अपनी कोख भी किराए पर देने में नहीं चूकती | अपने स्वार्थों  के लिए ये कोख में ही अपनी बेटी का गला घोट डालने में ज़रा  संकोच  नहीं करती | अपने  अवसर , अपने करियर की खातिर  ये बच्चों को" आया" के हवाले कर चल देती है |  बच्चों से पीछा  छुड़ाने  के लिए उन्हें  बहुत छोटी उमर में ही प्ले स्कूल  में छोड़ देती है | गए वो दिन जब माँ-- दो तीन  बर्ष  की उमर तक  के बच्चों को घर में ही पढ़ाया  करती थी |
संस्कारों , जीवन मूल्यों के पाठ अब घरों में नहीं पढाये जाते | बच्चों को अब रातों को कोई कहानियां  नहीं सुनाई जाती  ना कोई लोरी  | अपने काम अपने शौक और अपने फायदे  को देखने  वाली इन  माँओं     के पास अपने बच्चों केलिए  कोई समय नहीं |  ऐसा  नहीं है की उन्हें  अपने बच्चों की चिंता नहीं है | दिन में इक दो बार फोन करके वो " आया " से अपने बच्चों का हाल जरुर पूछ लेती हैं |
बच्चे भी अब माँ  से ज्यादा अपनी दूध की बोतल और आया को प्यार करते हैं | थोड़े बड़े होकर  वीडियों गेम  और फिर  नेट और मोबाईल उनके साथी बन जाते है | जितनी दूर माँ  हो रही है बच्चों से, उतने ही दूर बच्चे भी हो रहे हैं माँ से  | यही वजह है की जितने झूलाघर  रोज खुल  रहे हैं उनसे कहीं ज्यादा ओल्ड एज  होम   बनाये जा रहे हैं |
आधुनिक जीवन  शैली  और पुरुषों की नक़ल करने के चक्कर में महिलाओं ने खुद को अपने स्त्रियोंचित  गुणों से दूर कर लिया है | महिलाओं  में पुरुषों की तरह शराब और सिगरेट पीने का चलन  भी आम बात है | चिंता ये है की जो युवतियां  अपनी  राते  " पब " में  शराब और सिगरेट के धुएं में बिताती  हैं | क्या कल ये युवतियां इक अच्छी  पत्नी  या  इक अच्छी  माँ  बन सकेगी  ? क्या फिर कोई मुनव्वर राना  ये कह पायेगे की " की मैं जब तक घर नहीं जाता  मेरी माँ  सजदे में रहती है " ये कैसी  महिलाए हैं ? ये कैसी भविष्य की माँये  हैं ? जिनके दिल में किसी के लिए प्रेम नहीं , वात्सल्य  नहीं ये सिर्फ खुद से प्रेम करती हैं |  खुद के सुखों की खातिर अपना  घर परिवार  बच्चे  सब कुछ इक झटके में तोड़ देती हैं| छोड़ देती  है | { रोज बिखरते परिवार इसका  उदाहरण है }
अक्सर मैंने देखा है, शादी पार्टी या कोई  होटल या रेस्टोरेंट  में ये महिलायें  कभी भी अपने बच्चों को गोद में नहीं उठाती| या तो इनके पति बच्चों को देखते है | या आया को साथ रखती हैं | बच्चे रोये या बिलखते रहे इन्हें परवाह नहीं |इनकी साड़ी या मेकअप खराब  नहीं होना चाहिए | अपने बच्चों को अपनी गोद में रखने  में इन्हें अब शर्म  आती है | आजकल  पिताओं को मैंने  बच्चों की ज्यादा  परवाह करते देखा है | यदि वास्तव में  माँ की कहानियों और लोरियों में  ताकत होती  , पकड़ होती तो  युवा पीढ़ी  इस कदर भटकती नहीं |  कहीं न कहीं कोई कमी जरुर है जिसे बच्चे  बहार जाकर पूरी कर रहे है | दोस्तों में , नशे में  वो सुकून तलाश रहे है  जो उन्हें घर में ही मिलना चाहिए था | माँओं  को सोचना  होगा  की क्यों बेटे बेटियाँ उनसे दूर हो रहे हैं ? क्या बेटे के दुःख से उनका आँचल  अब भी भीगता है  या उन्होंने अपने बच्चों की उगंली  छोड़ दी है बेटे के परदेश में रोने पर भी उसका प्यारक्यों  भीगता  ?  यदि माँ की पकड़ ढीली  हो गयी तो क्या कोई  बेटा परदेश  में  ये बात महसूस  कर सकेगा                                                                              " मैं रोया परदेश में , भीगा माँ का प्यार
                                                                                     दुःख ने दुःख से बात की, बिन चिठ्ठी  बिन तार "