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बड़े अच्छे लगते है ..........और तुम

शुक्रवार, सितंबर 9 By मनवा , In

इक बहुत सुन्दर गीत है | बड़े अच्छे लगते हैं | ये धरती , ये नदियाँ , ये रैना , और ..........तुम | अक्सर सोचती हूँ | क्या ये नदियाँ , धरती , पहाड़ और आसमान हमेशा ही बड़े अच्छे लगते है ? और ये  इनके साथ ये "तुम " कौन है ? इस "तुम " को आखिर में क्यों रखा गया | जबकी मुझे लगता है की | ये सारा अच्छापन , और पूरा सच्चापन  इन्ही "तुम " की वजह से है | 
आप ही सोचीये दोस्तों | ये नदियाँ , पहाड़ , पंछी, फूल और तारे -सितारे तो शाश्वत हैं | फिर इस दुनियाँ के सभी लोगों को ये बड़े अच्छे क्यों नहीं लगते ? मुझे तो लगता है इस सारी दुनिया की हर चीज तभी खूबसूरत है | जब आपके जीवन में कोई "तुम " हो | मेरे आपके सबके जीवन में इस "तुम " की वजह से ही जिन्दगी का गीत पूर्ण होता है| 
जब जीवन में  "तुम " हो तो फूलों में खुश्बू महकती है | बहता पानी नदियाँ लगता है | खुरदुरी , पथरीली धरती सौंधी महक देने लगती है | पेड़ों पर बैठे पंछियों की भाषा समझ में आने लगती है | अपने आसपास  पल  रहे सभी रिश्ते सच्चे लगने लगते हैं | ऐसा क्यों  हुआ अचानक कभी सोचा है ? हमारे मन की दहलीजों पर जब कोई आहट होती है | जब कोई अपने कदमों के गहरे निशान  बनाने लगता है, दिल की जमी पर | फिर हमें समझ आता है की सागर खारा होते हुए भी नदियों को बड़ा अच्छा क्यों लगता है ?  रात के सन्नाटों में लहरे जड़ किनारों के कानों में जा -जा यही कहती होगी ना | ओ किनारों तुम कितने जड़ हो बहते क्यों नहीं मेरे साथ | और फिर किसी  दिन कोई किनारा चुपके से लहरों के साथ बह जाता होगा| ये कह कर की बड़े अच्छे लगते हो तुम | किसी बड़े वृक्ष के तने से लगी हुई कोई कोमल लता भी तो हौले हौले यही कहती होगी ना की बड़े अच्छे लगते है ..........| 
सुबह-सुबह , पेड़ों की पत्तियों पर जो अनगिनत बूंदे दिखती है ना | कभी उन्हें ध्यान से देखिएगा किसी ने रात को बड़े प्रेम से लिखा होगा | बड़े अच्छे लगते है ......सुबह सूरज की गर्मी से वो बुँदे वो स्पर्श पिघल जाते है | जैसे जिन्दगी की धूप हमारे जीवन से प्रेम , स्नेह , आत्मीयता को पिघलाकर हममे सूखापन  भर देती है | ये सूखापन ही हमें खुरदुरा बनाता है | मार डालता है | और  भीतर का गीलापन , भीतर की नमी हमें ज़िंदा रखती है |
जब तक हमारे मन के अन्दर गीलापन नहीं होगा | तरलता नहीं होगी | सरलता नहीं होगी , बहाब नहीं होगा | प्रवाह नहीं होगा |हम किसी से जुड़ ही नहीं सकते | और ना कोई अच्छा लगेगा कभी | हम कभी भी सुन्दरता को महसूस नहीं कर सकते | 
इस गीलेपन को बचा लिया होता तो | आज दुनिया में इतने संदेह ,शक , फरेब , अविश्वास और आतंक  नहीं होते |  
हरेक को नदिया , धरती , आसमान  बड़े  सुहाने, बड़े अच्छे लगते |  इस सुन्दर दुनियाँ को देखने के लिए सुन्दर आखें और सुन्दर मन चाहिए | और इक "तुम " भी चाहिए | वो "तुम " जो आपमें आपके जिन्दा  होने का अहसास भर दे | 
आपके अन्दर लहरों , को तरंगों को जन्म दे | जिसे  आप अपनी जिन्दगी के गीत में शामिल कर सके | जिसके आने से आपको  सूरज की धूप  ठंडक पहुंचाए | और जिसके समीप जाने  पर बर्फ  भी सुलगती सी महसूस हो| जिसे  सोचने के बाद , आपकी सोच बदल जाए , मन बदल जाए | उस तुम का होना  लाजमी है | जिसके होने से आपकी आखों में चमक और होठों पर मुस्काने ख़िल जाए |
वो "तुम " हम सब के पास है | आसपास है |लेकिन लेकिन लेकिन क्या हमने कभी उनसे कहा { उस "तुम " } से कहा ?  की  ये सारी दुनिया के झन्झट |ये उलझने| ये परेशानियाँ | ये जिम्मेदारियां | ये मजबूरियां | ये दुशवारियाँ, दूरियाँ | सिर्फ इसलिए अच्छे लगते है | क्योकिं तुम बड़े अच्छे लगते हो | 
और हाँ ये दौलत | ये शौहरत | गाड़ियां , बंगले , बैंक अकाउंट सब कितने झूठे है | मगर सच्चे लगते है ---ये आखें , वो बातें  वो शिकायते वो झगड़े  और ........और .............और .............तुम | 
नहीं कह पाए आज तक  तो आज ही कह दीजिये |अच्छा लगता है, कहना भी और सुनना भी की |  बड़े अच्छे लगते है ..........और तुम | 

तू इस तरह से मेरी जिन्दगी में शामिल है - - - --

शुक्रवार, जून 24 By मनवा , In

दोस्तों , तपती, जलती , चुभती गर्मी के बाद रिमझिम फुहारों का मौसम चला आया |यकीनन , गर्मी का मौसम जहाँ मन को रुखा-रुखा और उबाऊ  सा बना देता है | वहीँ ये ठंडी फुहारें मन की मिट्टी को यादों से, अहसासों से नम कर देती है | मैंने सोचा-- जरुर इस मौसम में आप सभी के दिल की मिट्टी अभी नम सी है| तो क्यों ना उसे धीरे से छू लूँ और कुछ अहसासों के पौधे  रोप दूँ |  ताकि अगली गर्मी तक ये अहसास मजबूत दरख्त बन जाये और लहलहायें और जिन्दगी की धूप में साया  बन कर ठंडक दे जाएँ |


अजी , ये तो बात शुरू करने का महज बहाना था | दरअसल ,मैं आज  उन रिश्तों की  , उन लोगो की बात करने वाली हूँ | जो हमारी जिन्दगी में शामिल तो हैं लेकिन हम उन्हें शामिल  करते नहीं | ये लोग शायद माला के १०८ मोती नहीं होते जिन्हें हम रोज जपते हैं|  ये वो अलग से शामिल मोती होता  हैं जो अतिरिक्त  होता है | जिसे कभी गिना नहीं जाता लेकिन {जिन्दगी की माला में } होता जरुर है |
दोस्तों , हमने अपनी जिन्दगी में रिश्तों  भीड़ खड़ी की है| अपनी जरुरत, अपने स्वार्थ,अपनी सुविधा , अपनी निर्भरता  के लिए हम जिन्दगी भर रिश्ते बनाते हैं | किसी के पद से प्रभावित , किसी के ख़ास गुण से आकर्षित तो किसी से भविष्य में लाभ की लालसा में हम इन रिश्तों को पालते हैं | सहते हैं | ढ़ोते हैं | शान से इन्हें गले में लटकाएं  घूमते हैं |ये हमारी जिन्दगी में शामिल हैं | लेकिन , हम कभी इनके सामने सहज नहीं होते | हम हमेशा इन रिश्तों से मौखुटे लगा कर मिलते हैं| ये ख़ास रिश्ते हैं हमारे लिए और इनके सामने हम खुद को आम महसूस करते हैं |इतने नाम हैं की हम  ऐसे लोगो का इक  कैलेण्डर  बना सकते हैं | लेकिन, लेकिन , लेकिन ......ज़रा अब नजर उन लोगों पर , उन रिश्तों पर ,जो आपको आपके "होने "का अहसास कराते हैं |जिनसे मिलकर आप बहने लगते हैं | जो आपको रोमांचित करते हैं | ये आपको "आम " से ख़ास बना देते हैं | ये आपके सपनों को तोड़ते नहीं , छीनते नहीं, बल्कि  उन्हें अपनी दुआओं से , अपनी उष्मा से भर देते हैं |
चलिए , उन रिश्तों के कैलेण्डर ना सही इक छोटी सूचि ही बना लें |अरे... इन रिश्तों  को नहीं जानते आप ? मैं बताती हूँ | ये वो लोग हैं जो भीड़ में भी आपको देख कर खुश हो जाते हैं | आपको भी इन्हें देख कर या मिल कर सच्ची ख़ुशी होती है | इनमे शामिल है वो आवाज़े जिन्हें फोन पर सुनकर आपके कानों को नहीं रूह को सुकून मिल जाता है |वो लोग जिनसे बात करके आप के चेहरे पर इक सरल मुस्कान ख़िल जाती है |
कुछ बेजान वस्तुए जो बहुत कुछ कह जाती है |कोई पत्र हो सकता है | कोई वाक्य हो सकता है | कोई किताब हो सकती है |
दोस्तों , इक बात कहूँ ? जिस दिन ये बेरहम दुनिया आपके सपने छिनने की कोशिश करती है| आपके वजूद को सिरे से नकारने की साजिश करती है | आप को अपनी सुविधा , जरुरत और अवसर की तरह इस्तेमाल करने लगती है | उसदिन आप क्या करते है ? अपनी बड़ी सी गाडी देखते हैं ? अपना बैंक बैलेंस ?अपनी फेसबुक पर हजार दो हजार दोस्तों की लिस्ट ? या उन रिश्तों को जो इक ही छत के नीचे बरसों से आपके साथ साये से चिपके हुए हैं ?
नहीं . नहीं . नहीं. ..हम कतई ऐसा नहीं करते  |हम  जिन्दगी में शामिल कैलेण्डर नहीं खोजते| हम पागलों की तरह उन लोगों को ढूंढते हैं | जिन्होंने जीवन के किसी मोड़ पर किसी समय हमें हमारे होने का अहसास करवाया था |हमसे , हमें मिलवा दिया था | हमारा आइना थे वो लोग जिसमे हम खुद को साफ साफ देख पाते थे | जिन्होंने कभी आपसे कहा था "तुम ख़ास हो मेरे लिए " | किसी ने बरसों पहले आपसे कहा था "सिर्फ तुम मेरे  लिए इस पूरी दुनिया में खास हो "| इस खासपन के अहसास मात्र  से हम कितने उर्जावान हो उठते हैं |
हमारे पास कुछ हो ना हो उन मीठे अहसासों की दौलत जरुर होना चाहिए | भले ही हमारा बैंक बैलेंस जीरो हो | लेकिन मन के ये खजाने  भरे होने चाहिए |
क्योकिं , यही वो सांसे हैं जो हमें ज़िंदा  रखती हैं | हम देह के अलावा भी कुछ है ये अहसास करवाती है | हम सारी दुनिया में इक आम इन्सान हो सकते है | लेकिन कोई ऐसा भी है जिसके  लिए हम ख़ास है | याद है दोस्तों राजकपूर के इक गीत में गरीब नायक से कोई नहीं कहता की उससे किसी को प्यार है तो इक केले बेचने वाली बुढियां {ललिता पवार } उससे कहती है मैंने दिल तुझको दिया ---| किसी के द्वारा  कहे गए ये अनमोल शब्द कैसे कोई भुला सकता है ?


तो चलिए , मेरे साथ खोज ले उन सभी रिश्तों को जो हमारी जिन्दगी में शामिल है पर दिखते नहीं | जो आसपास इक घेरा बना कर हमें छूते रहते है| पर कभी कुछ बदले में मांगते नहीं | हमें आभारी होना चाहिए  ऐसे रिश्तों का | जो बिना किसी स्वार्थ के हमसे जुड़ते हैं |जो आपके साथ नहीं होते बल्कि आपके लिए होते हैं |


आज की पोस्ट तमाम उन रिश्तों के नाम जो हमारी जिन्दगी में शामिल है पर दिखते नहीं  और जिनकी वजह से हम ज़िंदा है | ये रिश्ते हमारे भीतर पलते हैं |  अरे , आप तो यादों में खो गए | इक बात बताइए ? क्या आपने कभी किसी से कहा है की वो आपके लिए कितना ख़ास है ? चलिए इस बार तो कह ही दीजिये --"तू इस तरह से मेरी जिन्दगी में शामिल है "|

तुम इतना क्यों मुस्कुरा रहे हो ?

शुक्रवार, जून 3 By मनवा , In

दोस्तों , इस बार पोस्ट लिखने की वजह दो खबरें बनी हैं | इन खबरों को पिछले दिनों मैंने पढ़ा आप सभी ने भी जरुर देखा होगा | पहली तो ये की , अभिनेता  राजकिरण अमेरिका के इक शहर अटलांटा  के पागलखाने में मिले हैं |राजकिरण पिछले इक दशक से लापता थे | उनके सच्चे  दोस्तों दीप्ती नवल और ऋषि कपूर  ने उन्हें  ढूंढ़  निकाला है | ऋषि कपूर ने अपने खर्चे पर उन्हें खोजा | ऐसी सच्ची दोस्ती को मेरा नमन | राजकिरण  को आप सभी जानते होगे ये नाम  सुनते ही  जहन में  सबसे पहले इक सुन्दर सा चेहरा आता है|जिसकी बड़ी ही प्यारी और भोली  सी मुस्कान थी | अरे अभी भी याद नहीं आया  ? याद कीजिये  अर्थ फिल्म का वो   मधुर  गीत "तुम इतना जो मुस्कुरा  रहे हो क्या गम है जिसको छुपा  रहे हो ? " जीहाँ  ये वही  राजकिरण हैं जो इस गीत में अपनी  दोस्त से कहते है की बन जायेगे  जहर पीते- पीते जिन   अश्कों को तुम पीये  जा रहे हो |
 ऐसा  क्या हुआ राजकिरण के साथ की उनके अश्क जहर बन गए | कहाँ गए वो रिश्ते जिन्हें  उन्होंने उम्र  भर सहेजा होगा ? वो दोस्त जो उनके सफल दिनों में उनका साथ नहीं छोड़ते  थे| वो दुःख के क्षणों  में कहाँ  गायब हो गए ? क्या राजकिरण अपनी मुस्कराहट  के पीछे  दर्द  को छिपाने का हुनर  जानते थे ? या वे  अपनी हाथ की लकीरों  से ही  मात खा रहे थे ?
दूसरी  खबर , का इस खबर से कोई मेल तो नहीं है लेकिन दर्द और मुस्कराहट का रंग इसमे भी छलकता  है |खबर ये है की जयपुर शहर की १२ वर्षीया नैना इक अजीब सी बीमारी से पीड़ित  है हम सभी जानते है कोई भी बीमारी या कोई दर्द किसीके चेहरे पर हंसी नहीं ला सकता | लेकिन नैना के चेहरे पर हमेशा हंसी रहती है असहनीय  दर्द से जूझती  ये बच्ची विल्सन  नमक बीमारी से ग्रस्त  है | ये आनुवंशिक बीमारी से उसके सभी भाई बहन भी पीड़ित हैं | जयपुर के एस. ऍम. एस. अस्पताल में न्यूरोलोजी वार्ड में भर्ती बच्चों  के इलाज में माता पिता का घर  द्वार  सब बिक गया  लेकिन ना देह को दर्द से छुटकारा  मिलता है ना होठों  को खोखली मुस्कान से निजात मिलती है |
दोनों ही खबरे , मुझे अन्दर तक  द्रवित  करती हैं | इक में , कोई हँसता खिलखिलाता , मुस्कुराता  व्यक्ति , अचानक हमारे बीच से गायब हो जाता है | अपना देश छोड़  परदेश के पागल खाने में पाया जाता है |  उसके पास कोई क्यों नहीं होता ? उसका दर्द कोई क्यों नहीं समझता ? क्या पागलखाने के डॉक्टर , मनोवैज्ञानिक या मनोचिकित्सक किसी के  मन की अतल   गहराइयों में जाकर दर्द की तलहटी को छू सकते है?
कभी नहीं . वो सिर्फ मन को, भावना को और अहसासों को इक रासायनिक क्रिया  से ज्यादा कुछ नहीं बता सकते | मन की बाते , मन की उलझन , मन के दर्द के कोई मन वाला ही समझ सकता है| क्यों लोग अपने चेहरे पर झूठी मुस्कान चिपकाये घूमते है ? अन्दर अन्दर रो लेना  बाहर बाहर हंस लेना क्या ये तरीका ठीक है ? दुःख है तो भाई ,दुखी हो लो यार . रो लो जी भर कर | क्या जरुरी है दुनिया के सामने इक प्लास्टिक की हंसी चिपकाई जाये ?
दर्द है तो उसे   महसूस किया जाये ना की उसे पाला जाये | प्रेम है तो उसे भी महसूस किया जाये उसे अनदेखा ना किया जाये | हम प्रेम को भी छिपाते हैं और दर्द को भी | दुनिया से डर कर है ना ? जबकि ये बहुत ही सहज है | मौलिक है | गम को छिपा कर क्यों मुस्काए कोई ? और खुश  हो तो क्यों ना हँसे कोई ?  और जब हम मन की नहीं सुनते प्रक्रति  के विपरीत चलते है तो हम दर्द में मुस्काते है और खुश होंने पर ख़ुशी को भी दबा देते है | खुल कर हँसते नहीं| खुल कर रोते नहीं | लोग क्या कहेगे ? इसलिए मन की बात मन से कभी निकलती नहीं और फिर इक दिन वो आसूं जहर बन जाते हैं |
दूसरी खबर में ,कोई मासूम सी बच्ची अपने दो और भाई बहनों के साथ असहनीय  दर्द से गुज़रती है और होठों पर हंसी है |क्या गुज़रती होगी उस बेबस माँ  पर और असहाय  पिता पर वो  रोज खुदा से कहते होगे ये हंसी छीन लो पर दर्द से मुक्ति दो |तो दूसरी और राजकिरण के दोस्त कहते होगे कब आयेगी फिर से उस भले चेहरे पर भोली हंसी | दोनों जगह दर्द है हंसी है| लेकिन नियम नहीं है| इक जगह  बीमारी में होठों से चिपकी हंसी कुदरत का सन्देश देती है की , दर्द में हँसना  सिर्फ बीमारी है और कुछ नहीं | और दूजी तरफ राजकिरण तुम क्यों इतना मुस्कुरा गए की दर्द अपनी पराकाष्टा पर पहुंच गया और तुम्हे इस सुन्दर दुनिया से बेखबर कर दिया | और नैना  अब मुस्कराना  बंद कर दो ,तुम्हारी मुस्कराहट निच्छल  मुस्कान नहीं है वो उन तमाम लोगो को सन्देश देती है चेतावनी  देती है की सुनो, यदि तुमने सच्ची सहज मुस्कान अपने होठों पर नहीं खिलाई  और गम को छुपा कर मुस्काते रहे तो ये प्लास्टिक की हंसी इक दिन बीमारी बन जाएगी | कह उठेगे लोग तुम इतना क्यों मुस्कुरा रहे हो ?

आँच देगें ये सर्द रातों में -----------

बुधवार, जनवरी 5 By मनवा , In

दोस्तों ,इन दिनों मेरे शहर  में बहुत  सर्दी  है  , जाते जाते  ये सर्दी अपना रंग इस तरह दिखायेगी ये सोचा नहीं था ऐसा लग रहा हैकि,जैसे हम किसी " अपने "को विदा करने गए हों और वो हमसे विदा लेने से पहले  आखरी बार बड़ी ही आत्मीयता   के साथ हमसे  गले मिलने लगे ठीक इसी तरह ये सर्दी भी जाते जाते गले पड़ गयी है और कुछ ज्यादा  ही आत्मीय हो चली है की हमें  अलमारियों ,संदूकों में से स्वेटर  शाल  दुशाले  खंगालने  पड़  रहेहैं  खैर
दोस्तों ये तो बात शुरू करने का महज बहाना  था मनवा  में तो हमेशा  रिश्तों की बात होती है तो आज बात रिश्तों की उष्मा और गर्माहट की --दोस्तों  में अक्सर सोचती हूँ की हमारे रिशते भी तो स्वेटर ,शाल और  लिहाफों  की तरह हैं जो हमें  जिन्दगी की सर्द रातों में अनुभूति के स्पर्श  से उष्मा , आंच  देते रहते हैं इन स्वेटर रूपी रिश्तों में गर्माहट होती है आंच होती है जो हमें बर्फ  होने से जड़ होने से बचाती है जिन्दगी की सर्द और दर्द  भरी रातों में  जब हम तन्हा होते हैं तो हम दिलकी अलमारियों में से ,मन के संदूकों में से और यादों के गलियारों में से रिश्ते  खोजने लगते हैं ,तलाशने लगते है  ढूंडने  लगते हैं -की कहीं कोई रिश्ता  मिल जाये जो हमें  फिर से जीवित कर दे
दोस्तों ये रिशते भी क्या चीज है जब  जिन्दगी  दर्द की धूप से झुलसने लगती          है तो ये ठंडी  फुहार  बन जाते है और जब जिन्दगी सर्द हो जाती है  जब  बर्फ हो जाती है तो ये अपने कोमल स्पर्श से उसे पिघला  देते हैं दोनों ही सूरतों में ये हमें जीवित रखते हैं
तो चलिए मेरे साथ  ,इस सर्दी में   किसी भावना शून्य  हिमालय  की बर्फ पिघलायी  जाए ,किसी कोने में से कोई रिश्ता  उठाया जाये और उसकी आंच से कड़वाहट की  द्वेष  की बर्फ को हटाया  जाये  मेरी मानिये यक़ीनन ये रिशते सर्द रातों में आपको आंच देगे किसी ने क्या  खूब कहा  है "" आँच देगें ये सर्द रातों में दुशालों की तरह , मत तोडिये रिश्तों को कांच के प्यालों की तरह " तो दोस्तों स्नेह ,ममत्व ,सुरक्षा आत्मीयता , समीपता ,प्रेम के रिश्तों की आंच  के आगे  ये सर्दी क्या कर लेगी ? है ना  

ए अजनबी तू भी कभी आवाज दे कहीं से -----------------

बुधवार, दिसंबर 15 By मनवा , In

कल इक अहसास ने नींद से जगा दिया मैंने आखें खोली तो देखा बहुत से अजनबी साये चारों और मुझे घेरे हुए खड़े हैं ,पूछा कौन हो भाई ? और इस समय मेरे पास आप क्या कर रहे हैं ? जबकि सारी दुनियाँ नींद के आगोश में सतरंगी सपनों में खोई हुई है वे मुस्कुरा कर बोले हम अहसास हैं जो पहाड़ों के उस पार समन्दर के पीछे बसते हैं और आज तुम्हे खोजते हुए यहाँ आ पहुंचे हैं दोस्तों उनमे से कुछ अहसास मुझे बिलकुल अपने जैसे लगे जिन्हें मैंने अपने पास सहेज लिया और बाकियों को विदा कहा ये अहसास फूलों से भी हलके और नाजुक थे ओस की बूंदों से पवित्र बादलों से स्वच्छ और निर्मल मैंने उनसे फिर कहा ओ अजनबी तुम कैसे मुझे ढूंढ़ते हुए चले आये ? जबकि मुझे गुम     हुए तो बरसों हो गए हैं मेरा" पता "           मुझसे ही खो गया है फिर तुम्हे किसने बताया ? वे कहने लगे हमें अजनबी कह कर ना पुकारों हम तुम्हारा"" पता ""भी जानते हैं और तुम्हे भी तभी तो पहाड़ों के देश से बादलों के पार से हम चले आये हम तुम्हारा ही हिस्सा है तुम्हारे मन का हिस्सा आत्मा का हिस्सा तुम्हारी साँसों का हिस्सा जिस तरह टुकड़ो में तुम इस पार रहती हो हमभी तुम्हारे बिना टुकड़ो में जीते हैं दिन के उजालों में तुम हमें महसूस नहीं कर सकी तो रात के सन्नाटों में चुपके से चले आये हम सदियों से तुमसे मिलना चाहते थे तुम ही सोचो हम अजनबी होते तो क्या इस तरह से नींद से तुम्हें  जगाते ? मैंने पूछा ओ ,अहसासों तुम कहाँ रहोगे वे बोले हम हमेशा से ही मनके आसपास आत्मा के करीब और साँसों की गलियों में ही रहते आये हैं इसलिए वहीँ रहेगे दोस्तों --अनजान देश अनजान मोड़ से आने वाले इन अजनबियों ने मेरी जिंदगी ही बदल दी मेरे चारोंओर इन अहसासों ने इक घेरा बना लिया जो मुझे दिन रात छूता था मैं कहीं भी जाऊं ये हर जगह मेरे साथ होते थे मुझे अब गुलाब ज्यादा सुर्ख लगते थे और सारी दुनिया अपनी सी लगती थी पतझड भी सावन सा लगता था क्योकिं ये कोमल अहसास मुझे सदा भिगोये रखते थे दुनिया कितनी सुन्दर और अपनी सी जान पड़ती थी लगता था की इश्वर की सभी रचनाएं कितनी सुन्दर हैं




लेकिन दोस्तों इक दिन वो अहसास मुझे छोड़ कर चले गए हमेशा हमेशा के लिए अब ये दुनिया उतनी सुहानी नहीं रही न  अब  फूलों  में वो खुशबु ही रही ना हवा में वो सुगंध-- अब भीड़ में जी नहीं लगता दिन के उजालों से रात के स्याह अँधेरे भाते हैं उन अहसासों ने मुझे फिर से टुकड़ा- टुकड़ा कर दिया आधा हिस्सा फिर पहाड़ों के उसपार चला गया और आधा हिस्सा यहाँ यादों के वियाबानों में भटकता सा फिरता है ओ ,अहसासों तुम भी अपने इस हिस्से के बिना अधूरे हो ना ? फिर तुम कैसे जीते हो ? कभी इक बार वहीँ से आवाज तो दो या बादलों से सन्देश ही भेजो क्या कभी मेरे देश की मिट्टी की सोंधी खुशबु तुम्हे यहाँ आने को बेबस नहीं करती मुझे तो आसमान में भटकते बादल और  रात के सन्नाटों में चमकते  जुगनू  बता ही जाते हैं की तुम भी उस पार उदास हो भला तुमभी कब तक अपने आधे हिस्से से दूर जी सकोगे माना  की लोग कहते हैंकि  सिर्फ अहसास  है ये रूह से महसूस  करो लेकिन  मेरा मन कहता  हैकि  ए अजनबी  तू कभी  आवाज   दे कहीं से ---------------------

लगाये हैं हमने भी सपनों के पौधे --------

शुक्रवार, अक्टूबर 15 By मनवा , In

पिछले , दिनों इक मित्र  से चर्चा हो रही थी , उनका कहना था की जीवन में  जो  कटु  अनुभव होतें हैं उन्हें अपवाद मानना  चाहिए नियम नहीं लेकिन दोस्तों ना जाने मुझे क्यों लगता है की इन दिनों  कटु  अनुभव तो जैसे जीवन  के नियम नहीं नियति ही बन गए है  जिस तरह से रिश्तों के बीच मतलबपरस्ती , अवसरवादिता और स्वार्थ आ गये इन सब के बीच  यदि कहीं कोई सच्चा और निस्वार्थ रिश्ता  बन जाए तो ये अपवाद होगा
चीजों  में मिलावट की खबरें तो हम रोज ही सुनते हैं लेकिन अब इस मिलावट से रिश्तें भी अछूते नहीं है  की जिन रिश्तों में  मिलावट हो सोने चांदी की मैं  उन रिश्तों को ठुकराकर चला  जाउगां ---ये तो इक  गजल की लाइने हैं वास्तव में हम रिश्तों को ठुकराते नहीं है  उन्हें गले का हार बना कर नुमाइश  लगाते हैं इन कागज़ के सुन्दर फूलों  को  हम गुलदानों में सजाते हैं   दिलचस्प बात ये की हम जानते है की इनमे कोई खुशबु नहीं है वो तो उसी समय उड़ गयी थी जब हमने रिश्तों को अपनी जरुरत के हिसाब से बुनना शुरू किया था , वो सुगंध तो उस पल ही खो गयी थी जिस पल हमने रिश्तों   पर सवाल   उठायें थे उन्हें  साँस लेने से रोका था
हमने सोचा नहीं की जिस खुशबु को मुठ्ठी में बंद कर कर के हम उस पर अपना अधिकार जता रहे है वो तो कबकी हमारे हाथों से छू मंतर हो चुकी है पहले घरों में शीशे  के टूटने को अपशगुन कहते थे अब तो  रोज  घर  ही टूट  रहे है दिल टूट रहे हैं बस्तियां  उजड़ रही है लेकिन किसी को बुरा नहीं लगता हम क्या पत्थर हो गए है ?
इक कदम पर रिश्ते बनते हैं और अगले मोड़ पर टूट जाते है न कोई  दर्द ना कोई दुःख फिर जैसी जरुरत होगी वैसे रिश्ते बना लेगे  ------------
लेकिन-- लेकिन--लेकिन  इन सब के वावजूद  दिल वालों की बात किये बिना मैं जाने वाली नहीं  आप पूछेगें  कौन हैं ये दिल वाले ? अरे वही जो इतनी कठिन   हालातों में भी सपनों के पौधे   रोपते हैं इस भरोसे में की इन पर इक दिन प्रेम के सच्चाई के फूल खिलेगें ये वो दिल वाले हैं जो रिश्तों में खुशबु   ढूंढ़ते हैं  ये दिल की वादी सजाते हैं हर मोड़ पर इक खवाइश बोते हैं की जब जब दर्द की विरह की धूप जलाए तो ये रिश्तें  ठंडी छांह  कर दे जब दुःख की सर्दी जमाये तो ये अपनी उष्मा से हमें जिन्दा रखे  और जब सावन का मौसम  आये तो प्रेम की फुहारों से सराबोर कर दे
 दोस्तों  हम सभी प्यार की खुशबु ढूंढ़ते है तो  प्यार के बीज  क्यों  नहीं बोते ?     चलिए  आज ही इक सपना  आप भी बो दीजिये मेरी तरह  दिल की धरती पर और हाँ बादलो का ठिकाना नहीं है आये ना आये इसलिए अपने आसुओं से ही सींचना  होगा उस पोधे को किसी ने कहा है "अजब दिल की   बस्ती
अजब दिल की वादी
हरेक मोड़, मौसम
नयी ख्वाहिशों का
लगाए हैं हमने भी
सपनों के पौधे
मगर क्या भरोसा
यहाँ  बारिशों का""
 दोस्तों  आज के लिए इतना ही मुलाक़ात होगी अगली बार फिर किसी रिश्ते के साथ

दो पल के जीवन से इक उम्र चुरानी है ------

शुक्रवार, अक्टूबर 8 By मनवा , In

दोस्तों , इक बहुत ही ख़ूबसूरत गीत है ""इक प्यार का नगमा है मौजों की रवानी है जिन्दगी और कुछ भी नहीं तेरी मेरी कहानी है "" ----------इसी गीत की इक लाइन है की"" दो पल के जीवन से इक उम्र चुरानी है ""-----जब भी मैं ये लाइनें सुनती हूँ सोचती हूँ की क्या दो पल के जीवन से हम इक पूरी उम्र चुरा सकते हैं ? कैसे चुरा सकते हैं ? जीवन दो पलों का हो या हजार पलों का इक लम्बी उम्र कैसे कोई चुराए भला ? क्यों लिखी गयी होगीं ये पंक्तियाँ ? हमेशा की तरह इस बार भी मैंने अपने हिसाब से इनके अर्थ निकालें हैं सही है या गलत इसका फैसला आप पर छोड़ती हूँ




दोस्तों मुझे लगता है की जीवन तो सही में दो पल का ही होता है लेकिन जब इसमे कोई भी पल हम खुद के लिए नहीं जी पाते और ताउम्र समझोतों और सामंजस्य में ही बिताते चले जाते हैं तो यही दो पल का जीवन बोझिल बन कर सदियों सा लम्बा लगने लगता है हम इस पूरे जीवन में खुद को जान नहीं पाते और इक दिन अनजाने से इस दुनियाँ से विदा ले लेते हैं


हम जीवन तो जीते है लेकिन उम्र नहीं चुरा पाते उम्र चुराने से मतलब उन पलों से है जो हमने सिर्फ अपने लिए जीये, दिल की सुनी और खो गए खुद में ही , वो पल जब हम खुल के हसें , वो पल जब हम जी भर के रोये और वो पल जब हमने ये जाना की हम क्या है ? और हम क्या चाहते हैं ?जिस पल हमने खुद को नदी सा बहने दिया , हवा सा मुक्त कर दिया दोस्तों तभी तो चुरा ली थी हमने जिन्दगी है की नहीं ?


लेकिन क्या ये चोरी आसान है ? इस चोरी के अपने अलग नुक्सान हैं इस चोरी में आंसू बेहिसाब हैं अंतहीन प्रतीक्षा है असहनीय दर्द है और अव्यक्त भावनाएं हैं हजारों ख्वाहिशे ऐसी की हर ख्वाहिश पर दम निकले -----खुद को खोकर किसी के हो जाने की चाह , इसमे आप जाते हैं इक उम्र चुराने और इक लम्हा भी अपना नहीं हो पाता की "लम्हा लम्हा तरसे जिस लम्हें के लिए वो लम्हा भी आया तो इक लम्हे के लिए "


अरे आप तो उदास हो गए इस दो पल के जीवन से उम्र चुराने के फायदें भी है


ये चोरी आपको जीवन के अर्थ सिखाती है ये आपको रिश्तों के रहस्य बताती है ये आपको लम्बे बोझिल जीवन के रेगिस्तान में आशा के मरुद्यान दिखाती है ये साधारण स्त्री को मीरा बनाती है , ये कबीर बनाती है ये अम्रता प्रीतम , इमरोज और साहिर को गढ़ती है ये रजनीश को ओशो बना देती है ----------------


दोस्तों जीवन दो पल का जरुर है लेकिन इन दो पलों में से हमने इक पल भी खुद के लिए जी लिया तो ये इक लम्बी उम्र ही होगी और ये जिन्दगी और कुछ भी नहीं तेरी मेरी कहानी है लेकिन याद रहे दो पल के जीवन से इक उम्र चुरानी है

कागा सब तन खाइयो -------

शुक्रवार, अक्टूबर 1 By मनवा , In

कागा सब तन खाइयो ------- बचपन से ये पंक्तियाँ सुनती आई हूँ लेकिन पहले इनके अर्थ समझ नहीं आते थे . कागा यानि कौआ से कोई क्यों कहता है की कागा सब तन खाइयों मेरा चुन चुन खाइयो मांस , दो नैना मत खाइयो मोहे पिया मिलन की आस----------------




लेकिन जैसेजैसे जिन्दगी बहती गयी और रंग दिखाती गयी इन पंक्तियों के मैंने खुद ही अर्थ खोजे और खुद ही इन्हें समझने की कोशिश की दोस्तों मुझे लगता है की कागा यानि दुनियाँ के वे तमाम रिश्तें जो स्वार्थ , जरुरत , पर टिके हैं जो आपसे हमेशा कुछ ना कुछ लेने की बाँट ही जोहते हैं


कभी वे बहन भाई , माँ , पिता बन कर तो कभी पति -- पत्नी दोस्त या संतान बन कर आपको ठगते हैं उनके मुखोटों के पीछे इक कागा ही होता है जो अपनी नुकीली चोंच से हमारे वजूद को हमारे अस्तित्व को व्यक्तित्व को हमारे स्व को निज को खाता रहता है


हम लाख छुड़ाना चाहे खुद को वो हमें नहीं छोड़ता . वो हमारी देह को हमारे तन को खाता रहता है चुन चुन कर माँस का भक्षण करता रहता है अलग अलग नामों से अलग अलग रूपों में हमसे जुड़ता है और धीरे धीरे हमें ख़तम किये जाता है


ये तो हुआ कागा और हम कौन हैं ? सिर्फ देह सिर्फ भोगने की वस्तु ? किसी की जरुरत के लिए हाजिर सामान की डिमांड ड्राफ्ट ?


क्या है हम ?


और पिया कौन है ? जिसके मिलने की चाह में हम ज़िंदा हैं ? कागा के द्वारा सम्पूर्ण रूप से तन को खा जाने का भी हमें गम नहीं और उससे विनती की जा रही है की दो नैना मत खाइयों मोहे पिया मिलन की आस --कौन है ये पिया यक़ीनन वो परमात्मा ही होगा जिसकी तलाश में ये दो नैना टकटकी लगाए हैं की अब बस बहुत हुआ आ जाओ और सांसों के बंधन से देह को मुक्त करो






ये कागा उस विरहणी का मालिक भी है जिसने उसे बंदनी बना रखा है और जो अपने प्रियं की आस में आखों को बचाए रखने की विनती करती है की जब तक प्रियतम नहीं मिलते उसके प्राण नहीं जायेगे . कितना दर्द है और गहरे अर्थ भी है इन पंक्तियों में की कागा तू जी भर कर इस भौतिक देह को खाले . चुन चुन कर तू इसका भोग कर ले मगर दो नैना छोड़ देना की पिया मिलन की आस -------------


और कागा क्या करता है वो अपना काम बखूबी करता है अपनी जरुरत अपने अवसर और अपने सुख के लिए वो मांस का भक्षण किये जाता है उसे विरहणी की आखों में , या मन में झांकने की फुर्सत नहीं और आखों से उसे क्या सरोकार वो तो देह का सौदागर है ना और सौदागरों ने हमेशा अपने लाभ देखे है किसी की आखों में बहते दर्द नहीं देखे ना पराई पीर ही देखि इसीलिए वो कह उठी होगी की कागा सब तन खाइयों मेरा चुन चुन खाइयों माँस पर दो नैना मत खाइयों मोहे पिया मिलन की आस ---------------

सोचो तुमने और मैंने क्या पाया इंसा होके ?

शनिवार, सितंबर 25 By मनवा , In

जावेद अख्तर की इन सुन्दर पंक्तियों से आज बात शुरू करती हूँ , कितनी सार्थक और उतनी ही गहरी बात कही है वाकई कभी कभी सोचती हूँ की हमने क्या पाया अबतक ? जीवों में सबसे अधिक बुध्दिमान और ज्ञानवान होकर भी हम क्या पंछी , पवन और नदियों की तरह पवित्र निच्छल और जीवंत रह पाए है ?




मैंने किसी मित्र से कहा की अगले जनम में मैं नदी बनना चाहती हूँ तो उनका जबाव था वो नदी जो इन दिनों सभी जगह बस्तियां उजाड़ रही है ?


मैंने कहा , नदियों ने कभी बस्तियां नहीं उजाड़ी , नदियों ने हमेशा अपने किनारों पर बस्तियां बसाई है , पत्थर में फूल खिलाये है , हमेशा लोगों की प्यास बुझाने वाली नदी क्या किसी को उजाड़ सकती है? कतई नहीं नारी और नदी को समाज ने कभी समझा ही नहीं जबकि हमारी संस्कृति हमारे पुराण और वेद , आख्यान नारी और नदियों की महानता से भरे पड़े है और कहा भी गया है की इन्हें सम्मान दिया जाना चाहिए दोनों ही जीवन पर्यन्त अपनी गति से बहती है लोगो को संतुष्ट करती है बदले में कुछ नहीं मांगती लेकिन जब जब भी इन्हें इनकी धारा के विपरीत मोड़ने की कोशिश की गयी ये उग्र रूप धारण करती है फिर जो पूर नदी में आता है उसमे बस्ती , ही नहीं देश ही नहीं सभ्यता भी डूब जाती हैं


पत्थर के जड़ किनारे भला नदियों का दर्द क्या समझेगे वो क्या कभी जान सकेगें की "वो नदिया फिर वो प्यासी भेद ये गहरा बात ज़रा सी ---- पत्थर के किनारे उसकी मंजिल नहीं उसे तो सागर में ही जा मिलना है वो सागर जिसका ह्रदय विशाल हो जो उसे अपने में समाहित कर ले ये गहरी बात क्या पत्थर के किनारे जान सकते हैं की सबके पाप अपने सर पर उठाये गंगा फिर भी पवित्र क्यों बनी हुई है ? क्योकिं बह बहती है


जो बहता है वो जिन्दा है जो रुक गया वो मर गया अपने अंहकार से अकड़े किनारे क्या कभी ये जान पायेगे की , अपने स्वार्थ अपने लोभ ने उन्हें पत्थर बना दिया जो कभी किसी के दुःख से हिलते नहीं किसी के दर्द से पिघलते नहीं बस बेजान पड़े है सदियों से इक जगह पर बहते ही नहीं


दोस्तों हम भी तो जड़ हो गए है ना किनारों की तरह , हम पंछियों की तरह चहकते नहीं , पवन की तरह उन्मुक्त नहीं और नदियों की तरह बहते नहीं हम संवेदन शून्य हो गए हम प्लास्टिक की हंसी हसते है कोई क्या कहेगा इसलिए चाहते हुए भी हंसते नहीं कोई देख ना ले कोई जान ना ले इसी में हम उलझ गए है हमने खुद ही नियम बनाए खुद ही जंजीरे गढ़ी और व्यवस्थाएं बनायी और खुद ही पत्थरों की बस्ती बना कर उसमे कैद हो गए क्या हम जिन्दा है ? या जीने का ढोंग करते हैं ?हम खुद को अभिव्यक्त नहीं करते हम ऐसे क्यों हो गए ?


हमारी बुध्दी ,हमारा ज्ञान ही हमें मार डाले जा रहा है हम खुद से ही दूर हो गए रिश्तों से दूर हो गए अब हमें कोई हँसता दिखता है तो हम उस पर हँसने लगते है की पागल है कोई किसी से प्रेम करता तो भी हम उस पर हंसते है की मनो रोगी है क्योंकि हम खुद को बहुत ही समझदार और होशियार मानते है क्या हम वास्तव में समझदार हैं ? हम से अच्छे तो पंछी हैं जो किसी पर हंसते नहीं , किसी से नाराज नहीं होते किसी को छलते नहीं किसी को दुःख नहीं देते बस प्रेम से रहते हैं उनके लिए कोई सीमा नहीं सरहद नहीं वे जहां चाहे जाए . , हम क्यों नहीं नदी बन जाते और क्यों नहीं हम किसी के अहसासों में बह जाते सारी सरहदे तोड़ के , क्यों ना हम हवा बन जाते हमारा कोई वतन ना हो कोई देश न हो हम चाहे जहां बहे सेहरा में भी और चमन में भी कोई हमें बांध ना सके


क्या आपका मन भी कभी आकाश में उड़ते पंछी और बहती नदी को देख ये नहीं कहता की " पंछी नदियाँ , पवन के झोकें कोई सरहद ना इन्हें रोके , सरहद इंसानों के लिए है सोचो तुमने और मैंने क्या पाया इंसा होके ?

हम कई सदियों तक तुझे घूम कर देखा करते "

मंगलवार, सितंबर 21 By मनवा , In

पिछले दिनों "  मुझको भी तरकीब  सिखा दे यार  जुलाहे -----" वाली  पोस्ट पर  कोलकाता से इक मित्र  का मेल आया  वे बड़े ही सहज भाव से पूछती हैं की कहाँ  मिलेगा वो जुलाहा ?  ऐसा लगा की हम में से हर किसी को उस जुलाहे की तलाश है जो हमें रिश्तें सहेजने की तरकीब  सिखा दे लेकिन दोस्तों  क्या सही में हम से हर कोई रिश्तों को सहेजना चाहता है? कितने लोग है जो सचमुच रिश्तों को टूटने से बचाना चाहते हैं ?  कितने लोग है जो अपनो के खो जाने से डरते हैं ? बहुत कम , बहुत ही कम है ऐसे लोग--- या यूँ कहूँ की कुछ ही लोगो को  लगता  है ये रोग
दोस्तों जिन्हें ये रोग है वो सिर्फ भाव में बहते हैं , प्रेम में जीते हैं और दर्द के सागर में डूबते उतरते  रहते हैं , अहसासों के यादों के वियाबनों में जुगनू की तरह खुद को जलाके रौशनी करते रहते हैं
ये वो लोग है जो हाथ छूट----       जाने पर भी रिश्तों के अहसासों से खुद को अलग नहीं कर पाते इनकी वक्त की शाख से लम्हें हमेशा चिपके रहते हैं मुझे तो लगता है की इक अलग ही दुनिया के प्राणी है  ये लोग समय से परे है इनकी सोच इनकी दुनिया , तभी तो इस समझदार दुनिया के समझदार होशियार और चतुर लोग  इन्हें  मनो रोगी कहते है  दीवाना  करार देते हैं  स्वार्थी , मतलबी और अवसरवादियों की दुनिया में रिश्तों की कोई अहमियत नहीं होती वे हमेशा अपनी सुविधा , लाभ और  जरुरत के हिसाब से रिश्तों की उम्र तय करते हैं जब तक आप उन्हें लाभ पहुचातें है रिश्ता  जीवित है जरुरत ख़तम ,  तो रिश्ता भी ख़तम
अब आप जिन्दगी भर उस मुसाफिर की  राह देखते रहिये , जो अपने कदमों के निशान तक नहीं छोड़ गया , और आप है की उसका उसका पीछा करते - करते खुद को ख़तम किये जाते है ऐसे दरिया क पीछा सदियों तक आप करते हैं की " बह रही है तेरे  जानिब ही मेरे पैरोंकी जमीं थक गए दौड़ते दरियाओं का पीछा करते करते आपके  दौड़ने , आपके थकने आपके पैरों के  छाले फूटने का दर्द उसे नहीं होता उस मुसाफिर ने तो पलट कर इक बार भी नहीं देखा और आप है की उसके अहसासों का बोझ  उठाये फिरते है
दोस्तों कभी कभी सोचती हूँ  जिन लोगो को किसी के अहसास नहीं छूते किसी के भाव नहीं पिघलाते     जिन पर किसी की आहों का असर नहीं होता जिनकी आखों में किसी के लिए  आसूं नहीं उमड़ते क्या वो लोग सही मायनों में ज़िंदा है  ? या देह के लिबास को सिर्फ तब तक  ढो    रहे हैं की जब तक सांस चल रही है
किसी के लिए पल  दो पल रो लेना   कुछ पल के लिए ही सही पर किसी के हो जाना ही ज़िंदा होने की निशानी है हाँ लेकिन ये आसान नहीं , किसी के इक वादे पर एतबार कर उम्र गुजार देना , कोई कहीं से जरुर आएगा इस इन्तजार में सदिया काट देना , हर आहट पर कहीं वो तो नहीं का गुमा होना ,  शायद किसी ने पुकारा इस भरोसे पर खुश हो जाना और दौड़ कर दरवाजे तक बार बार आना   सरे राह चलते चलते ठिठक कर रुक जाना की शायद उसने मुड कर आवाज दी हो -------लेकिन जब किसी को कहीं नहीं पाया दूर दूर तक तो मन कह उठा
काश --तूने आवाज दी होती  मुड कर वरना हम कई सदियों तक तुझे घूम कर देखा करते "

"" मुझको भी तरकीब सिखा दे यार जुलाहे ------

मंगलवार, सितंबर 14 By मनवा , In

दोस्तों , बहुत दिनों से आपसे बात नहीं हुई , कभी -कभी ऐसा भी होता है कि., हम सिर्फ सोचते ही रह जाते हैं और कह नहीं पाते , विचार दिमाग में और भाव मन में उमड़ते तो हैं लेकिन शब्दों में ढल नहीं पाते , भावों को इक सिरे से पिरोने में कठिनाई होने लगती  है
दोस्तों , ऐसी ही स्थिति आज मेरी हो रही है सोचती हूँ रिश्तों पर लिखूं या ,समाज पर . मन पर  लिखूं या प्रेम पर , खुद पर लिखूं या ओरों  पर इक विचार का सिरा पकड़कर लिखना शुरू करती हूँ तो दूसरा सिरा गुम हो जाता  है , फिर उसे पकडू तो  बाकी सारे भाव तितलियों के मानिंद फुर्र से उड़ जाते हैं
अब इन चंचल तितलियों को कौन पकड़े चलिए , ऐसा करती हूँ जो सिरा हाथ लगता है उसे ही पकड़ कर बात शुरू करती हूँ देखना दोस्तों बाकी सारे  भाव भी चुपचाप इक के पीछे इक धीरे धीरे आकर खुद ही जुड़ते जायेगें
दोस्तों  असल जिन्दगीं  में  भी तो हम कुछ ऐसा ही करते हैं रिश्तों के ताने बाने बुनते है इक सिरा यहाँ से इक वहां से और ताउम्र अपने इस ताने बाने के खेल में हारते जीतते रहते हैं इक सिरा  टुटा तो उसे जोड़ने लगे फिर वहां दूसरा   टूटा तो उसे बनाने लगे कहीं संतुलन बिगड़ ना जाये इसी होशियारी में अपनी जिन्दगी  गुजार देते है लेकिन लाख     जतन करने पर भी यही होता है कि ""  गाँठ अगर पड़ जाए तो रिश्तें हो या डोरी . लाख  करें कोशिश जुड़ने में वक्त तो लगता है ""हम अपनी जरूरतों के हिसाब से रिश्तें तो बुन लेते हैं कभी दोस्ती के रिश्तें , प्रेम के रिश्तें , उजागर रिश्तें , छुपे  रिश्तें , दिखावे के रिश्तें , छलावे के रिश्तें  और ना जाने कितने बेनाम रिश्तें हम अपनी जिन्दगी में बुनते है और इन में उलझते रहते है लेकिन कोई ऐसी तरकीब हमें नहीं आती कि हम इन्हें टूटने से बचाले
कभी कभी सोचती हूँ , लोहे कि जंजीरों से भी मजबूत रिश्तें  ज़रा से बात पे कैसे चट्ट से टूट जाते हैं और पट्ट से हमेशा के लिए दूर हो जाते है क्या कोई ऐसा रसायन नहीं है जो इन रिश्तों को  फिर से पहले कि तरह नया कर दे अब आप कहेगे कि प्रेम का रसायन ही रिश्तों   कि रिपेयरिंग कर सकता है तो मैं कहुगीं कि जनाब  सबसे ज्यादा  गाँठ प्रेम में ही पड़ती है और प्रेम के रिश्तों में पड़ी दरारे किसी भी रसायन से नहीं भरती
बहरहाल मैं बात कर रही थी कि कोई ऐसी  तरकीब  नहीं है क्या जो रिश्तों को टूटने से बचाले , और यदि टूट कर जुड़  जाए तो गाँठ नजर आये   तरकीब से याद आया  इस विषय पर गुलजार ने बहुत ही  ख़ूबसूरत और गहरी बात कही है वे कहते हैं कि
"मुझको भी तरकीब सिखा दे  यार जुलाहे
अक्सर तुझको देखा है कि ताना बुनते
जब कोई तागा टूट गया या ख़तम हुआ
फिर से बाँध के और सिरा कोई जोड़ के उसमे
आगे बुनने लगते हो
तेरे इस ताने में लेकिन इक भी गाँठ गिरह  बुन्तर क़ी
देख नहीं सकता कोई 
मैंने  तो इक बार बुना था
इक ही रिश्ता
लेकिन उसकी   सारी गिरहें
साफ़ नजर आती हैं
दोस्तों  हैं ना गहरी बात --इससे पहले क़ी कोई रिश्ता हम से जाने अनजाने टूट जाए उसे हम बचाले  वरना  वो टूटने के बाद फिर से नहीं बन सकेगा और यदि बन भी गया तो उसकी गांठे आपको चैन  से जीने नहीं देगीं  वे आपको चुभती रहेगी और आप  भी कह उठेगे "" मुझको भी  तरकीब सिखा दे यार जुलाहे ------