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शहद जीने का मिला करता है थोड़ा -थोड़ा .......

गुरुवार, अक्टूबर 13 By मनवा , In

पिछले दिनों , किसी बगीचे में इक बहुत बड़े वृक्ष को देखा मैंने | उस विशाल वृक्ष पर इक सुन्दर लता यानी बेल लिपटी हुई थी | बहुत देर तक उन्हें देखती रही और ये तय नहीं कर पायी की कौन ज्यादा सुन्दर है | और कौन किसकी सुन्दरता  बढ़ा रहा है | वृक्ष ने उस कोमल लता को अपना  सानिध्य दिया   है | या बेल ने खुद को समर्पित कर दिया वृक्ष पर | मैंने खुद ही मान लिया की कोई इक नहीं , दोनों ही सुन्दर हैं | लेकिन इक दूजे की वजह से | 
कुछ दिनों बाद , देखा की वृक्ष पर कोई बेल नहीं थी | बेल टूटी हुई सी सड़क किनारे पड़ी थी | और वृक्ष भी सूना- सूना सा डरावना सा लग रहा था | बगीचे के माली से पूछने पर उसने बताया की बेल को कीड़े वाला कोई पौधों का रोग हो गया था | कहीं वृक्ष भी इससे प्रभावित ना  हो जाए | इसलिए बेल को ही तोड़ कर फेंक दिया गया था | 
मैं बहुत देर सोचती रही | माली को , रोग का इलाज करना था | उसे ठीक करना था | उसने तो वृक्ष को बेल से अलग ही कर दिया | क्यों किया उसने ऐसा ?
दोस्तों , असल जिन्दगी में भी तो हम आजकल यही कर रहे है ना | आये दिन टूटते विवाह | बढ़ते तलाक | ह्त्या , आत्महत्या |  और किसी को चोट पहुंचाने या उसे जिन्दगी से अलग कर देने या खुद को दुख देकर हम हर समस्याओं के हल ढूंढ़ रहे है | 
लेकिन , हल तो फिर भी नहीं मिलते हमें | अगर , किसी को जिन्दगी से अलग कर देने से या खुद को किसी की जिन्दगी से दूर करने से ही समाधान हो जाते तो आज दुनिया में कितनी शान्ति होती | 
क्या हमने कभी सोचा| की हमारे साथी , मित्र , भाई , बहन या कोई भी आसपास रहने वाले व्यक्ति का व्यवहार हमारे  प्रति , समाज के प्रति अचानक से क्यों बदल गया ?जो कल तक जान से ज्यादा प्रेम कर रहा था | वो आज जान का दुश्मन कैसे हो गया ? चलिए सीधी बात करती हूँ |
पिछले दिनों , विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस था | और इस संगठन के अनुसार सारी दुनिया में मानसिक रोगियों की संख्या इकदम से बढ़ गयी है | और इन्हीं मानसिक रोगों की वजह से रिश्तों में दरारे  आ रही हैं | 
आधुनिकता की दौड़ | इकदूजे को नीचा दिखाने की होड़ | पैसा | झूठी शान | दिखावे की जिन्दगी ने | और समय की कमी ने लोगों को  बहुत सी मानसिक बीमारियाँ दी है | जैसे -फोबिया , मूड डिस-आर्डर , काग्नेटिवडिस -आर्डर , साइजो-प्रेनिया ,  अल्कोहल पर निर्भरता और डिप्रेशन |ये तो सिर्फ चंद नाम है | फेहरिस्त बहुत लम्बी है | 
इन रोगों की वजह से आये दिन समाज में , रिश्ते उलझ रहे है | टूट रहे हैं | कारण समझ नहीं आते लेकिन ये हो रहा है |
दरअसल , देह के रोग दिखते हैं | उसके लक्षण भी नजर आते हैं | लेकिन मन के रोग नहीं दिखते | कोई ये कैसे बताये की वो कितने किलोग्राम दुखी है | की उसके मन पर दर्द की कितनी दरारें हैं | उसके दिमाग में कितनी अशांति है | उसे नापने के लिए कोई पैमाना नहीं किसी डॉक्टर के पास | 
मन के विकारों को तो रोगी अपने विचारों , भावनाओं तथा व्यवहार से ही प्रकट करेगा ना ?
ये बात तो सिर्फ और सिर्फ वही व्यक्ति जान सकता है | जो बहुत करीब हो | जो उसे समझे | लेकिन किसी के मन को समझना क्या आसान है ? मन का  कोई रूप नहीं | आकर नहीं | सीमाएं नहीं | और इससे बड़ी बात ये की किसी के पास अब धैर्य नहीं | समझ भी नहीं | कोई किसी को समझाना नहीं चाहता और ना ही समझना   चाहता है | 
किसी के मन की विचित्र स्थिति को भांप लेना | और विवेक से समाधान निकालना कोई नहीं चाहता | उलटे इसे पूर्वजन्मों के पाप | टोने टोटके | भूत- प्रेत और ग्रहों का फेर  कहा जाता है | और पंडित , तांत्रिक , ओझा खूब इसका फायदा उठा रहे हैं | रत्न , ताबीज , यंत्र और फेंगशुई का कारोबार खूब चल निकला है | हाँ कुछ लोग चिकित्सा का सहारा भी लेते है | पर सिर्फ दवा से मन के घाव कैसे भरेगे ?
जरुरत है साथी के व्यवहार में आये असुन्तुलन के पीछे छिपे दर्द को देखने की | ना की दोषारोपण करने की | मन के रोगी को प्रेम की जरुरत होती है | हमारे स्नेह की | आत्मीयता की | हमदर्दी की | सहानुभूति की | और जब ये नहीं मिलता तो मन की हालत बिगड़ती जाती है |
इसी के चलते , हर व्यक्ति मन की सूखे टुकड़े को हरा करने के प्रयास करने लगता है |  कोई तो मुझे समझे | कोई तो मन के तल तक पहुंचे | ये विचार ही नए नए रिश्ते बनने -बनाने का सबब बनता है | 
हम घर का सामान , कपडे , जूते, कार , गहने  खरीदते समय उन चीजों को सौ बार उलट पलट कर देखते हैं | लेकिन जो साथी आपके साथ इक पूरी जिन्दगी बिता रहा है | उसके चेहरे को गौर से देखते तक नहीं |
जिन्दगी की भागदौड में कौन कितने पीछे छूट गया ज़रा देखीये तो सही | कौनसा सिरा उलझ गया और कौन कहा भटक गया देखे तो ज़रा | आखरी बार कब हँसे थे जी खोल कर सोचे ज़रा | किसी के होठों पर कब मुस्काने आई हमारी वजह से | याद है ? 
वृक्ष पर लिपटी लता वृक्ष के कारण सुन्दर नहींवो इसलिए सुन्दर है की वृक्ष उसे रोकता नहीं फैलने से | लिपटने से | जैसे साहिल से सट कर जो दरिया बहता है उसे बहने दिया जाए हम क्यों रुख मोड़ते है | बहते दरिया का |  मन की गांठे , प्रेम के स्पर्श से ही खुलती है | दो बोल प्यार के जादू भरा असर करते है | और दो कड़वे बोल किसी का दिल छलनी कर देते है | लेकिन किसी भी डाक्टर के पास  ऐसी कोई मशीन नहीं जिसमे ये छेद या सुराख़ दिखे | 
तो क्यों ना  हम , किताबों की जगह किसी का मन पढ़े | सामानों की जगह दिलों की देखभाल करे | दीवाली पर हजारों दिए रोशन करने से बेहतर है | अपने मन में प्रेम की लों जलाये | और अन्तिम बात जगजीत की गजल के साथ की " शहद जीने का मिला करता है थोड़ा -थोड़ा | " इस शहद को संभाल के रखे हम | है ना ? 

मिट्टी से खेलते हो बार- बार किसलिए ?

शुक्रवार, जून 10 By मनवा , In

कल मेरे ,शहर में  अचानक कहीं से भटके हुए    बादल आये और बरस कर चले गए | बरसात के आते ही पूरा वातावरण , मिट्टी की सोंधी  खुशबू से   महकने  लगा | इक पल पहले जो,सूखी मिट्टी तपती धरती का हिस्सा थी |जो सूरज की  तपन और जलन में सुर- से सुर  मिला कर जल रही थी | बादलों के बरसते ही कैसे झट से ,सोंधी महक में बदल गयी | सख्त ,चुभती ,सूखी .धूल उड़ाती आखों में खटकती मिट्टी , बूंदों से  मिलते  ही कैसी मुलायम ,लचीली और सुगन्धित  बन गयी |
दोस्तों , हम भी तो इसी मिट्टी से बने हैं ना ?हमारी  मिट्टी की देह  इक दिन इसी मिट्टी में मिल  जाएगी | जब हम सभी इक ही मिट्टी से बने हैं| फिर क्या बात है की सभी की खुशबू  अलग -अलग  है ? और यही खुशबु  हमें सबसे अलग  बनाती है | किसी से जुड़ने से पहले हमें उसकी खुशबु आ जाती है और हमारे आसपास अहसास महकने लगते हैं |
दोस्तों , क्या कभी सूखी मिट्टी,में कोई खुशबु होती है ? नहीं |  जब तक प्रेम के अपनेपन के आत्मीयता के अहसास बूंदों के रूप में नहीं बरसते , नहीं छलकते  तब तक कोई  भी मिट्टी  खुशबु  नहीं दे सकती  हाँ वो उड़ उड़ कर किसी की आँख में चुभन  जरुर पैदा करसकती है | लेकिन जब हम किसी अहसास से जुड़ते हैं तो हम भी सोंधी महक से महकने  लगते  हैं | इसलिए ,रिश्तों की मूरत बनाने के लिए सूखी मिट्टी के अलावा  अहसास के बादल भी  होना जरुरी है |
दोस्तों , इस  बात के अलावा  इस मिट्टी को देख इक सवाल और उठता है मेरे मन में | हम सभी मिट्टी के खिलौने है और वो ऊपर आसमान में बैठा विधाता  कुम्हार है | वही,हमें बनाता है | वही हमें बिगाड़ भी देता है | इस मिट्टी की भी अज़ब तासीर  है | वो जिस रूप में चाहे हमें ढाल देता है | हम सिर्फ खिलौने  हैं | इतने कच्चे की साँसों के स्पंदन से ही बिखर जाए , पक्के  इतने की हर  तूफ़ान सह जाए | आसमान में बैठे  उस कुम्हार के खेल कभी समझ नहीं आते | क्यों वो नित नए माटी के पुतले गढ़ता  है , और फिर उन्हें तोड़ भी देता कभी -कभी इक सवाल मन में  उठता  है की उस कुम्हार से पूछूं की तुम्हे ये मिट्टी के खेल क्यों कर इतने भाते हैं ? खिलौने बनाना  तक तो  ठीक था  लेकिन , उनमे  जो प्रेम के , आत्मीयता के , अपनेपन के अहसास भर देते हो | जिनकी खुशबु की वजह से ये खिलौने  जीवित हो उठते हैं |  तुम उन्हें अपनी मर्जी से  करीब लाते हो , और अपनी मर्जी से अलग भी कर देते हो |कभी सोचा  है तुमने इन मिट्टी के खिलौनों  को भी दर्द होता है | पीड़ा  होती है | आखों से आसूं बहते है , मन से आहें उठती है |  दो मन , दो विचार , दो तकदीरे , आपस में जुड़ने ही वाली होती हैं  तो तुम झट से उन्हें अलग  कर देते हो | तोड़ देते हो | ऐसा करते हुए तुम्हारा मन नहीं दुखता ? मन समझते हो ना तुम ? या मन जैसी कोई चीज तुम्हारे पास है भी या नहीं  ? लोग कहते हैं तुम टूटे दिलों में रहते हो| तो क्या अपने रहने के लिए तुम जानबूझ कर दिलों को तोड़ते हो ?  इक आखरी बात बताओ | टूटे हुए खिलौनों  से तुम्हे क्यों प्यार है ? मिट्टी के इस खेल को बंद कर दो या ये बता दो की " मिट्टी से खेलते हो बार- बार किसलिए ? टूटे हुए खिलोनों से प्यार किसलिए ?

"हंगामा क्यों है बरपा , थोड़ी सी जो "जी " ली है

मंगलवार, मई 24 By मनवा , In

दोस्तों , आज  कुछ  लिखने से पहले  इक समाचार   आपको  सुना  रही हूँ |पंजाब राज्य महिला आयोग ने महिलाओं को सलाह देने के लिए,
समझाइश देने के लिए इक परचा प्रकाशित करवाया है|जिसमे कहा गया है कि, महिलायें फोन पर बातें ना करें | इससे पुरुषों को ईर्ष्या  हो सकती है| इससे तलाक में बढोतरी हो रही है |महिलाओं को चाहिए कि मोबाइल पर बात ना करे इसकेबजाय   वो अच्छी पत्नी बनकर घरेलूं काम पर ध्यान दें |
 

सबसे पहले तो गंभीरता  से सोचने वाली बात  ये है कि आखिर आयोग को ऐसा परचा जारी क्यों करना  पड़ा ?  क्या सच में पुरुष महिलाओं के मोबाइल फोन पर बात करने से ईर्ष्या करते है ? इसका जबाव   है  हाँ | मैंने अपने आसपास ऐसे बहुत  से पुरुषों को देखा है जो ये कतई बर्दाश्त नहीं कर पाते कि , उनकी पत्नी या प्रेमिका उनके अलावा  किसी और पुरुष  से बात करे | बहुत से पतियों ने अपनी बीबियों के मोबाईल तोड़ दिए या फेंक दिए या चुरा लिए | इतना ही नहीं अपनी साथी के फोन डिटेल्स देखना  और मेसेज  पढ़ना{ वो भी अधिकार से} आम बात है |  पिछले  दिनों  बेंगलौर के इक साफ्टवेयर इंजिनियर ने अपनी इंजिनियर पत्नी  को सिर्फ इसलिए मार डाला क्योकिं  उसे शक था कि वो किसी और से प्यार करने लगी है { यहाँ गौर करने वाली बात ये है कि उन दोनों ने कुछ दिनों पहले ही प्रेम विवाह  किया था }
अब बात राज्य महिला आयोग के हास्यास्पद बयान पर --मैं आयोग से पूछना  चाहती हूँ कि पुरुष कब से ईर्ष्यालु  होने लगे | ये तो महिलाओं का विशेष गुण था ना ? इक कमजोर,  अबला , नारी का गुण  | क्या इतने कमजोर हो गए हमारे विशवास कि इक बेजान वस्तु के कारण  टूटने लगे | दूसरी बात यदि  फोन कि वजह से तलाक हो रहे है तो प्रतिबन्ध सिर्फ महिलाओं पर ही क्यों ? पुरुषों को भी मनाही होनी चाहिए कि वो भी मोबाईल ना रखे |
जो आज मोबाइल कि वजह से शक कर रहे है | कल वो किसी और वजह से शक करेगे शायद इन्टरनेट कि वजह से |हो सकता है महिला आयोग का अगला फरमान हो कि महिलाओं को नेट का उपयोग नहीं करना चाहिए | फिर ----अन्तिम फरमान कि महिलाओं को तो साँस भी नहीं लेना चाहिए  | उन्हें जिन्दगी जीनी  ही नहीं चहिये  है ना ?
 मेरी इक दोस्त ने बताया कि उसके मंगेतर ने उसे सगाई पर मोबाइल गिफ्ट किया था | जिससे वो दिन भर बाते करती थी | शादी होते ही मोबाईल वापस ले लिया कि अब क्या जरुरत तुम्हे मेरे आलावा किसी से बात करने कि--------वाह रे मेरे भारतीय पुरुष तुम्हे सलाम | क्या कोई महिला या लड़की कि जिन्दगी "तेरे नाम से शुरू तेरे नाम पे ख़तम हो जाती है " उसकी अपनी कोई जिन्दगी नहीं | उसके अपने विचार , उसके अपने मत नहीं हो सकते ?
उसके अपने मित्र या रिश्ते नाते नहीं हो सकते ? जब सदियों से भारतीय स्त्री अपने पति पर आखं मूंद कर विश्वास करती आई है | वो चाहे देश में हो या परदेश में उसे याद करती आई है | पुरुष कि वेवफाई , उसकी लम्पटता , उसकी मौजमस्ती और उसके अन्याय के दर्द को अपने लाल सिंदूर में और बड़ी सी बिंदियाँ में छिपाती आई है | तो पुरुष उस पर भरोसा  क्यों नहीं करता ?
आज , यदि वो अपनी जिम्मेदारियों को पूरा करने के साथ साथ कुछ वक्त अपने  लिए निकाल लेती है | कुछ देर वो खुश हो लेती है | कुछ पल वो हंस लेती है तो इतना हंगामा क्यों है भाई ? आज क्यों पुरुष का विश्वास अपनी जीवन संगिनी पर से उठ गया ? सिर्फ इसलिए कि वो अब घर से बहार जाकर काम करने लगी है | वो जागरूक हो गयी है | सदियों तक खामोशी से सब सुनते सुनते उसने अब सवाल पूछना शुरू कर दिए| इसलिए विश्वास टूट गए ? कितने कमजोर है हमारे विशवास | इन खोखले विश्वासों को कब तक कोई भारतीय महिला अपने सुहाग चिन्हों में छुपा कर ढ़ोती रहेगी | उसे भी जीने का हक़ है | उस अपने पति बच्चों मायके ससुराल के लोगो से ही नहीं खुद से भी मोहब्बत करने का हक़ है | उसे भी साँस लेने का हक़ है | उसके जीने पर ,उसके जिन्दगी "जी " लेने पर इतना  हंगामा क्यों ? आखरी बात महिला आयोग से --कि , विवाह मोबाइल से नहीं टूटते और ना सिर्फ महिलाये ही दोषी है विवाह टूटने क़ी| विवाह को बचाना  है तो पहले विश्वास को टूटने से बचाना होगा | दिलों को चटकने से बचाना होगा | कोई जीता है ख़ुशी से तो उसे जीने दिया जाये ना क़ी हंगामा किया जाये | क्या हुआ कोई थोड़ी सी जी लेना चाहता जिन्दगी को |गुलाम अली कि गजल के  शेर को मैंने थोड़ा  बदल दिया है मैं कहती हूँ  |
 
"हंगामा क्यों है बरपा , थोड़ी सी जो "जी " ली है
डाका तो नहीं डाला , चोरी तो नहीं क़ी है "

गम की स्याही दिखती है कहाँ ?------------------------

गुरुवार, मई 19 By मनवा , In

दोस्तों ,कल  मैं कुछ लिखने बैठी  ही थी , कि मेरे शहर में आंधी तूफान  का मौसम  बन गया | ऐसी आंधी चली  कि , टेबल पर रखे सारे कोरे कागज़ उड़ने लगे | मैं उन्हें जितना संभालती  वो उतने दी दूर होते जा रहे थे | मन बहुत उदास था मानों कोई साथी बिछड़  गया हो |आखिर थक हार के मैंने कुछ भी नहीं लिखने का फैसला  कर लिया | तभी इक कोरे कागज का टुकड़ा उड़ते  हुए आया और कहने लगा लिखो ना लिखती क्यों नहीं ?" मनवा "में तो हमेशा रिश्तों कि बात होती है ना आज हम पर ही कुछ कह दो | मैंने कहा कैसे लिखूं फिर से इक नयी दास्तान , गम कि स्याही दिखती है कहाँ ? "
दोस्तों , मैंने उन कागजों को समेटा और सोचने लगी | कितना पुराना  और आत्मीय  रिश्ता है मेरा इन कागजों से | ठीक वैसा ही जैसा किसी बेटी का अपनी माँ  से होता है | जब वो अपने दुखों कि गठरी  माँ के आँचल में छुप कर खोल  देती है और हल्की हो जाती है| जैसे कोई प्रेयसी अपने बरसों के बिछड़े  प्रेमी  से मिलकर  उसके काँधे पर अपना  सर रखकर रोलेती है और उसकी रूह  में अपना दर्द उड़ेल देती हो|
कुछ ऐसा ही पवित्र  रिश्ता है | मेरा इन सफ़ेद  कागजों के साथ |  ये मेरे सच्चे साथी हैं | ये मेरे साथ हमेशा रहते है | इनसे मैंने हमेशा  अपनी अव्यक्त  भावनाएं  बांटी है | वक्त के लम्हों में कैद  वो कोमल भावनाएं आज भी  सोयी हुई है कितनी सुन्दर कितनी अपनी  सी जिन्हें इन कागजों  ने किसी से नहीं कहा बस खुद तक ही रखा |
आप सोच रहे होगें  इतनी बड़ी दुनियाँ में  , रिश्तों की भीड़ में  और संबंधों के ताने बानों के बीच  इन कागजों से क्यों कर रिश्ता बनाया जाए ?
तो चलिए ,मैं बताती हूँ इनसे रिश्ता क्यों  बनाया  जाये | जब सारी दुनियाँ में आप खुद को तनहा महसूस करे | आपकी बात कोई समझे नहीं | जब मन के सागर में दर्द की लहरें उठने लगे | आपकी  दर्द भरी आह  मीलों तक जाकर वापस आ जाये |  दूर  तक खामोशी का सिलसिला  हो| तब आप क्या करेगे ? इन कागजों पर खुद को  उड़ेल दीजिये ना | इन पर गिरे  आंसूं  अपने गहरे निशान  छोड़ते हैं | जिन्हें आप कभी भी स्पर्श करके महसूस कर सकते है|
दोस्तों , कभी कभी ऐसा भी होता है ना , जब दर्द  अपनी  सीमाएं तोड़ने लगता है | उस समय सांसे तो चलती है लेकिन हम ज़िंदा नहीं होते | आखों में हजारों  सपने  जरुर होते है लेकिन टुकड़ों की शक्ल में |होठों पर हजारों सवाल ऐसे होते हैं जिनके जवाव  बने ही नहीं | धड़कने जब भटक कर दिल को तलाशने  लगे जैसे कोई दस्तक किसी  दरवाजे का पता पूछने लगे |
आपकी रूह जब देह से जुदा होने  लगे , कोई आसपास ना हो , तो आप लिख दीजिये ना इक इबारत कोरे कागजों पर | आप इन पर चाहे कितना गुस्सा होले , नाराज होले  , कितने ताने मार ले कटाक्ष  कर ले , ये फिर भी ख़ामोशी से आपको खुद में समा लेगे  | ये आप पर हक़ नहीं जताते , ये आपसे हिसाब नहीं माँगते ये आपके दर्द को जज्ब कर लेते है खुद में | ये आपके सवालों से परेशान नहीं होते बस चुपचाप  सुनते हैं | ये आपके सच्चे साथी है |
तो चलिए फिर आज इक नयी दास्ताँ  लिखे , अरे  --आप क्या सोचने लगे की अपनी भावनाएं  कैसे व्यक्त कर दे सबके सामने  तो यही कहुगीं की आप लिखिए तो सही  आपको  लिखने के लिए किसी स्याही या की बोर्ड की जरुरत नहीं होगी बस आखों वाले पानी से काम चल जाएगा  | हाँ और उसे पढ़ना  हर किसी के बस की बात भी नहीं है | अब वो नजर ही नहीं किसी के पास जो आसुंओं की जुबान  पढ़े | गम की स्याही किसी को नजर नहीं आती दोस्तों उसे सिर्फ महसूस किया जा सकता है |
लो फिर इक कागज के टुकड़े ने आकार मेरे कान में कह दिया की " कैसे लिखोगी इक नयी दास्ताँ ,गम की स्याही दिखती है कहाँ ?

जब जलने लगे जंगल खुद , अपनी ही छाँव से --

मंगलवार, मई 3 By मनवा , In

दोस्तों ,आज आप जरुर हैरान हैं पोस्ट का शीर्षक  पढ़कर  है ना ? आप कहेगे जंगलों को जलते तो सुना था , लेकिन ये कैसी अजीब  बात है की जंगल खुद जलने  लगे| अपनी ही छाँव  से |ये तो वही बात हुई की सागर शिकायत करे की वो प्यासा  है |जिस सागर में  दुनियाँ जहान की मीठी  नदियाँ आकर मिलती हैं | वो भला कैसे  प्यासा हो गया ? इसीतरह ,  जो जंगल मनुहार कर- कर के सावन को बुलाते  हैं, और धरती की प्यास बुझाते हैं |जो अपने  हरे भरे वृक्षों की छाँव में पंथियों और पंछियों  को आश्रय  देते हैं | वो जंगल उसी छाँव  में  कैसे जलने लगते  है ?
दोस्तों , ये क्यों जलते है ? इसका जवाब  मैं खोजने ही जा  रही थी , की मुझे चाँद , सूरज , पहाड़ , नदी , सावन  और सागर  ने आवाज  दी और  अपनी व्यथा  कह सुनाई |
जो मैं आपसे  शेयर करती हूँ | दोस्तों दरअसल सभी के अपने -अपने दुःख और अपने- अपने सुख  हैं | जंगल में भटकते हुए हिरन जिस खुशबूं  से  परेशान है | वो उसी की कस्तूरी  है उसे कौन बताये  ? चाँद , जो हमेशा से सुन्दरता और प्रेम का प्रतीक बना  बैठा है | उसके पास  दर्द के गहरे स्याह  गड्डे है जिसे कोई प्रेमी देख  नहीं पाता| सूरज की अपनी पीड़ा  है | सारे ब्रम्हांड का स्वामी | जो समूची  धरती को जीवन देता है  | उसकी उष्मा , और तपिश  इतनी की कोई  समीप  जाना  ही नहीं  चाहता | सूरज अकेले ही जलता  रहता है कोई उसके संग नहीं क्यों ? सावन  के अपने दुःख की धरती की प्यास बुझाते बुझाते वो कितना  प्यासा हो गया | कोई नहीं जानता क्यों ? धरती के अपने प्रश्न की सदियों से सहते सहते थक गयी  | उसके पुत्र  माँ -माँ  कह कर उसे उलीचते रहे और किसी ने भी सीने पर पड़ी  दरारों  को नहीं गिना क्यों ?
आकाश  का  अपना  सूनापन  अलग है -कोई तारे उधार ले गया | कोई चाँद मांग के ले गया | कोई आया  तो मेघ चुरा ले गया  तो कोई काली  घटा को छीन के ले गया  | आकाश  फिर  खाली  हो गया क्यों ?
दोस्तों , हमारे जीवन में भी तो यही होता हैं ना | दुनियाँ के लिए  जीने वाले ,दुनिया के दर्द को गले लगाने  वाले | दुनियाँ केलिए  बहने वाले , महकने वाले , खिलने वाले , खुशबू बिखेरने वाले | रोने वालों को अपना  कंधा  देने वाले |दूसरों  के आसूं  पोछने  वाले | दूसरों के जीवन के उलझे हुए धागों को सुलझाने वाले |क्यों इकरोज  उदास होजाते हैं दुखी होजाते हैं ?  ये जंगल खुद अपनी छाँव  में क्यों जलने लगते हैं ?
दोस्तों , मैं बताती हूँ |  रूह तो उनकी भी होती है ना जो दूसरे को रूहानी सुकून देते है | प्यास तो उनकी भी होती है ना जो दूसरों को सावन देते हैं | सागर भी तो ,चाहता है की कोई मीठी गागर उसके खारेपन को ख़तम कर दे | कोई घटा  आकाश  के सूनेपन को भर दे | तो चलिए ना  किसी सागर की गागर बन जाए | किसी आकाश की  घटा | किसी धरती के सूखे  टुकड़े पर चलो कोई सावन  रख दें |चलिए ये पंक्तियाँ  सुनिए
"बादलों का नाम ना हो ,अम्बरों के गाँव में
जलता हो जंगल खुद अपनी छाँव में
यही तो है मौसम , आओ तुम और हम
बारिश के नगमे गुनगुनाएं
थोड़ा सा  रूमानी हो जाएँ "
दर्द को बांसुरी  बनाए "
तो, दोस्तों चलिए  दर्द को अबकी बार बांसुरीं  बना ले .| किसी जंगल को छावं  में जलने से बचा ले |

सीने में कुछ -- बहुत -बहुत दुखता है -------------

शुक्रवार, अप्रैल 22 By मनवा , In

पिछले दिनों , मुंबई के इक अपार्टमेन्ट  से इक महिला ने अपने ६ साल के  बेटे के साथ छलांग  लगा कर ख़ुदकुशी  कर ली . जिस समय वो गिरी  , उनके पति महोदय ने शोर सुना  और  ये समझ कर दौड़े की कोई अन्य महिला  कूदी हैं लेकिन जब पास गए तो  पता  चला की वो उनकी बीबी और बेटा ही हैं पति  महोदय  पर क्या  गुजरी ये तो वही जाने  लेकिन भीड़ में से आवाज़े आ रही थी की महिला  पागल  थी जो बच्चे के साथ  कूदी { मतलब  बच्चे के बिना ही कूद जाना  था } कोई कह रहा  था पति परमेश्वर  शक करते थे
बहरहाल ,  जब भी आसपास  इस तरह  की  घटनाएँ  घटती  हैं  कुछ सवालात  मेरे  जहन को परेशान  करने लगते हैं की इक छत  के नीचे रहने वाले , इक कमरे को शेयर करने वाले  अपनी जरुरत के वक्त पास आने वाले इक दूसरे के दुःख से कैसे अनजान रह जाते हैं ?  ख़ुदकुशी  करने वाली महिला उस दिन  अपने रोजमर्रा के कार्यों  को बखूबी  अंजाम देती रही  और मन ही मन अपने अमूल्य  जीवन  को समाप्त  करने  की योजना भी बनाती गयी . खाना  बनाना  घर साफ करना  और सारे  जरुरी काम उसके मशीनी  हाथ  करते गए और कमालये की  किसी को उसने अपने दुःख की भनक  भी नहीं  लगने दी कोई भी स्त्री जब घर संभालती है तो  उसकी मशीनी देह  घर के हर सदस्य की जरुरत के हिसाब  लचीली  होती जाती है कब किसको कहाँ क्या चहिये घर के बुजुर्ग हो या बच्चे  बिन कहे मन की बात समझ जाने  वाली  स्त्री  बरसों बरस तक   समर्पण भाव से  अपने  दायित्व निभाती चली जाती है  और इक समय आने पर वो इक मशीन की तरह   नो  कम्प्लेंड नो डिमांड  की तरह  घर का इक पुर्जा  हो जाती है  जिसकी जरुरत  सभी को  है , लेकिन उसके साथ रहने वाले  ये भूल जाते है की इस मशीन  के अन्दर भी इक दिल धड़कता  है  उसे भी प्यार  स्नेह और आत्मीयता  की  जरुरत  है
आत्म ह्त्या  करने वाली स्त्री  के पति परमेश्वर उस पर शक करते थे  उन्हें  इक चाबी  वाली स्त्री चहिये थी  जो उनके अनुसार जितना वो चाहे  उतना  ही जिए ,उनके  लिए हँसे उनके दुःख में रोये  उनके लिए साँस ले और इक दिन उनके लिए मर जाये  है न ? वो भूल गए की जो स्त्री जो उनकी बीबी है उनके बच्चों की माँ है लेकिन इन सबसे पहले वो इक  इन्सान  भी तो है  उसका , हंसना , खिलखिलाना ,  महकना  उसका  स्वाभिमान उसकी अपनी  जागीर है इन  पर किसी का अधिकार  नहीं और जो  कोई इन्हें चोट पहुंचाए  तो दिल टूटते  हैं और दर्द बहता  है ऐसा  ही कुछ  उस अभागी स्त्री  के साथ भी हुआ होगा
अपनी  जीवन संगनी  के   चेहरे पर उभरते  दर्द से कोई कैसे अन्जान  रह गया  जिस चेहरे  को आप  रोज देखते हो  उन पर पड़ी दर्द की बारीक़  रेखाओं   को कोई क्यों नहीं पढ़  पाता?
इतने बेखबर ,बेकदर  बेपरवाह होकर कोई  कैसे रह सकता है ?  देह को छूते रहे उम्र भर  और मन  की छांह  भी नहीं पा सके  किसी शायर  की पंक्तियाँ  याद आ रही हैं की "जिस्म की बात  नहीं  है  उनके दिल तक जाना  था  लम्बी  दूरी तय करने में वक्त  तो लगता  है "    और जब तक ये  मन  तक की दूरी  तय  नहीं की जायेगी  रिश्ते यूँ ही बिखरते  रहेगे किसी के देह के मालिक होने से पहले उसके मन की  रियासत  तो  जीत  ली  जाए  , कहीं  गहरे में कोई दिल तो नहीं दुःख रहा इसका  ध्यान  रखना  होगा ,
दोस्तों  मेरे इक मित्र  है जो शायर  है  उनकी  लिखी  बहुत सुन्दर लाइने आपसे  शेयर  कर रही हूँ  की
"बहते- बहते रगों में जैसे
खून रुकता है
शर्म से सर खुद्दारी का
पल-पल झुकता है,
तेरी हाँ में हाँ ,ना में ना
चुप में चुप ,लेकिन
सीनेमें कुछ --
बहुत -बहुत  दुखता  है

रोक लो , रूठ कर उनको जाने ना दो -------------

गुरुवार, अप्रैल 14 By मनवा , In

पिछले दिनों , नोएडा {उत्तर प्रदेश } की दो बहनों  अनुराधा और सोनाली  को पुलिस वालों  ने   खुद  उनके घर से  मुक्त कराया .हैरान  हो दोस्तों ? भला  अपने घर में भी कोई  कैसे कैद  होता  है लेकिन हाँ  उन दोनीं अभागी  बहनों को मरने  जैसी हालत  में  घर से निकाला गया  जिसमे से कल इक बहन की मौत  हो चुकी है  और दूसरी  गंभीर  हालत  में है
दोस्तों ,उपरी तौर  पर तो यही कहते पाए गए लोग की  दोनों पागल थी  और किसे फुर्सत है किसीके पागलपन में  हिस्सेदार होने की
, सच है  हम समझदारों की दुनिया  में किसी पागल या  रोगी की क्या  अहमियत ? दोनों बहने अवसाद  की शिकार थी और आठ महीनों  से दुनिया से बेखबर  थी  उस  घर में जहां वे कभी चहकती महकती और फुदकती थीं   जिसे उनके पिता  लेफ्टिनेंट  कर्नल  ने बनवाया  था पांच  लोगो के हंसते खेलते  परिवार  की  ये बेटियाँ  , इक बहादुर  पिता की  बेटियाँ  आखिर  इक  ऐसी बीमारी से  ग्रस्त  हो गयी जिसे डाक्टर  रोयर्ड पैरानोइड  कह रहे है  जिसमे  रोगी  हमेशा  भयभीत  और असुरक्षित  महसूस  करता  है
 दोस्तों  ,महिला  आयोग  जो भी कहे  प्रशासनिक  जाँच  कुछ  भी कहे  और  डाक्टर्स  की रिपोर्ट  कुछ  भी कहे  मुझे  तो लगता  है  हमने हमारे समाज  ने ही उन्हें  मारा  है अवसाद  या कोई भी मानसिक  बीमारी की वजह  क्या है ? और क्या इलाज है इनका ?हर मानसिक बीमारी की वजह  तनाव  और डर ही होता है  और हर बीमारी का इलाज  अपना पन और स्नेह  ही होता है
 माता - पिता  की मौत और भाई की बेरुखी  से  दुखी बहनों  ने खुद को अपने  घर में ही  कैद  कर लिया --  सोचती हूँ ,जो पिता  खुद सेना  में  थे उन्होंने  बेटियों  को इस बेरहम दुनिया  से लड़ने का पाठ क्यों नहीं पढ़ाया ? जिस भाई की कलाई पर   बरसों बरस  जिन बहनों ने  राखी का पवित्र  धागा  बांधा और भाई ने सर पर हाथ रख कर  जिंदगी भर की  सुरक्षा  का वचन  दिया  उस भाई की बहने आज   इतनी भयभीत और असुरक्षित कैसे हो गयी ?
अनुराधा ओर सोनाली  जब स्वस्थ  थी और नौकरी करती थी तब  तो उनके दोस्त जरुर  उनके साथ होगें ,उन्होंने भी  इतने सालों में उनकी कोई खबर नहीं ली ? क्या स्वस्थ सुन्दर  और हंसते  व्यक्ति  से ही प्रेम या दोस्ती   निभाई जाती है जो अस्वस्थ  है रोगी है या हमारी  जरुरत का नहीं तो हम उसे भुला दे ?
आस पड़ोस वाले भी इतने संवेदन शून्य  की   अपने अपने घरों  में चैन से सोते रहे  और पास की दीवारों से सिसकियाँ  आती रही  ,  हम क्रिकेट   के जूनून में रातों को सडकों पर सारी रात  नाच  सकतें  हैं  , भ्रष्टाचार  के विरोध में  मोमबत्तियां  जलाने का ढोंग  कर सकते  हैं हम इतने समझदार  हैंकि क्रिकेट  को धर्म  और खिलाडियों  को भगवान मानते हैं  हम  खेल  में हारने  पर दुखी होकर  और जीतने पर खुश होकर अपनी जान दे भी सकते है और ले भी सकते है   फेस बुक  पर घंटों  किसी मुद्दें  पर लम्बी  बहस कर सकते  हैं  लेकिन लेकिन  लेकिन  किसी अपने  का दर्द या पराये  का दुःख  हमें विचलित  नहीं  करता
दरअसल हमने    पत्थरों  के बड़े  बड़े  मकानों  की दुनियां  बसाई है  जिसके बड़े बड़े  दरवाजों के अन्दर हम दुनिया के दुःख दर्द से बेखबर  हैं  हमें दीवार के उसपार  से सिसकियों  की आवाज  सुनाई  नहीं देती , हम रास्तों  पर भी चलते है तो  कारों के शीशे  चढ़ा  कर ताकि आसपास की  गंदगी , सड़ांध  से दर्द से दुःख  से हम खुद को  बचा सके  ,हम अपने आसपास  हमेशा  सुन्दर , सुहाना  ही देखना  चाहते  हैं
जब सभी  को सुख , ख़ुशी  और खूबसूरती  चाहिए  तो दर्द   दुःख  और विष  कौन पीये ? कौन पोंछें  उन जख्मों  से रिसते  मवादों को ? कौन  प्यार  करे उनसे  जो प्यार के लायक  नहीं , दोस्तों जो प्यार के लायक हैं  और जिन्हें प्यार की जरुरत नहीं सभी उनसे प्यार क्यों  करते हैं ? जो सचमुच  प्रेम के हक़दार हैं  और प्रेम के लायक  भी नहीं हमें उनसे भी प्यार  करना  होगा  तभी प्रेम  सार्थक  होगा , दोस्ती  सफल होगी , उन  टूटे दिलों की मरम्मत  कौन करेगा ? उजड़ी बस्तियों को  कौन  बसाएगा ?  उन रिश्तों  की खोज  खबर भी  लेनी होगी  जो हमने बना  तो लिए  लेकिन  जरुरत न होने पर उन्हें खूंटी  पर टांग  दिया , पुराने कोट  की तरह ---
क्यों कर  कोई अनुराधा  और सोनाली  पल पल  मौत को गले लगाती  रही  ? क्या चाह होगी  उनकी ? किसी से , सिर्फ  प्यार अपनापन  और स्नेह  ही ना -- दो बोल  भी हम किसी को न दे सके तो हमसे बड़ा  कंगाल  कौन होगा ?
किसी की रो रो कर सूज गयी आखों  में प्यार की चमक  क्यों नहीं भर देते हम ? किसी के दर्द से सूखे होठों  पर इक प्यारी  मुस्कान  क्यों नहीं धर देते हम ? क्यों कोई इतनी खूबसूरत दुनिया से रूठ कर चला  जाये और हम उसे  पागल  अवसादी  रोगी  कह कर पल्ला  झाड़ ले  , क्यों कोई बिन प्यार के  बिन  स्नेह  के रीता -रीता  सा  चला जाये  चलिए  किसी के सूनेपन को अपनेपन  से बदल ले ,और दर्द को ख़ुशी से  और रोक ले , रूठ कर जाने वालों को  जो ये चले गए तो फिर नहीं आयेगे  लौट कर  ये रूठे तो  धरती से प्यार  विश्वास  और अपनापन  भी रूठ जाएगा  तो .- रोक लो , रूठ कर उनको जाने ना दो --

कुछ इस तरह तेरी पलकें , मेरी पलकों पे सजा दे ------------------

सोमवार, मार्च 21 By मनवा , In

कल  "होली "के रंगों  में डूबा  रहा  मेरा शहर .. और रात को होली की खुमारी  से थक कर जब पूरा शहर गहरी नींद के आगोश  में था  तभी मैंने  कुछ मधुर सी आवाज़े सुनी , मैंने सुना  कोई  किसी से कह रहा था ,दोस्त   -सारा शहर  सो रहा  है तुम क्यों  जाग रही हो ? दूसरी  हंसते  हुए  बोली  तुम भी  कहाँ  सोयी हो ? क्या  सोच  रही हो ? अब तक मुझे समझ  में आ गया  था की  ये    संवाद दो आखों की  पलकों के बीच  हो रहा  है मैं  ध्यान  से उनकी  बातें  सुनने लगी
इक पलक ने दूसरी से अपना हाल कहना शुरू किया  इक बोली   दोस्त ,आज तुमने होली खेली क्या ? दूसरी बोली दोस्त हम तो हर पल ही आसुंओं  में रंगी  रहती हैं  हमारी तो हर पल ही होली है  ये माना  की आसुओं से पलकों के मरासिम {रिश्तें } पुराने हैं  फिर भी दिल कभी  ये नहीं सोचता  की हम इतनी छोटी छोटी आखों में इतना  दर्द कैसे  समेटेगी जब भी दिल की बस्ती में दर्द बढ़  जाता है हम उसे अपने ऊपर  उठा लेती हैं. मेरी तो समझ में ये नहीं आता  की ये दर्द आखिर आता कहाँ से हैं ? लेकिन जब भी ये आता है सब कुछ  कितना  धुंआ  धुंआ सा लगने लगता  है किसीकी सांसे  घुटती सी महसूस होती है मैंने देखा है  लोगों के होंठ  सिल जाते हैं  उनके पास शब्द  नहीं होते , भाव शून्य हो जातें हैं दूर दूर तक सन्नाटा  होता  है सारी दुनिया में शोर होता है लेकिन इस बस्ती में खामोशी , तब दूसरी पलक ने कहा  हाँ दोस्त मैंने सुना है की सीने  में धड़कन  के आसपास  ही दर्द का गाँव  होता  है ये धुंआ  शायद  वही से उठता है , ठहरता  है लोगो कोदर्द से  भर देता है और आखों  के रस्ते से फिर से   खाली कर देता है ये पलकों से बहने वाला सागर जो बिलकुल खारा  होता  है ये दिल से उठकर गले तक भर आता  है और फिर बहने लगता  है पलकों के किनारों से हमारी कतारों से बूंद बूंद करके ना जाने कितने समन्दर खाली  हो गए  है ना ?
पर दोस्त इस दर्द के बहने का जरिया  हम कब तक बनी रहेगी ?क्या किसी को हमारा ख्याल  भी है ?ये आसुओं के मोती हम जब नहीं संभाल पाती  हैं तो जमीन  पर गिरा  देती हैं  कभी कभी लगता है क्या हाथ मिलाने वाले ,गले मिलने  वाले  दोस्त कभी  इन पलकों के आंसुओं   को देख पाते हैं ? कोई  अहसास कोई रिश्ता इन मोतियों  को मिट्टी में मिलने से क्यों नहीं बचा  पाता ?
कोई अपनी पलकों  को हमसे जोड़ कर  ये अनमोल मोती क्यों  नहीं चुरा  लेता ?पागल  हो तुम दोस्त ,  इन मोतियों की दुनिया के बाजारों में कोई कीमत नहीं --सदियों से ये मोती  दिल के सागर में जन्म लेते है पलकों पर सजते  है और  गालों से ढलक  कर जमीन में मिलते रहे हैं  तभी तो मिट्टी में इतनी  सौंधी  खुशबूं  है
दोस्त अब ये अकेले  बोझ सहा  नहीं जाता   तब दूसरी पलक बोली  दोस्त काश मैं तुम्हारे दर्द को हल्का  कर पाती  क्या कोई ऐसी  युक्ति या टेक्निक  नहीं है जो इक आँख ,दूसरी आखं  से मिलकर उसके दर्द को कम कर दे  नहीं दोस्त आखें  हमेशा साथ साथ  रहती तो है पर मिलती कभी  नहीं --और इस दुःख को मन में  लिए पलकें  नींद  से बोझिल  हो कर  बंद हो गयी  मुंद गयी लेकिन मैं सोचने लगी   रिश्तों के हूजुम में कई तरह के रिश्ते हमने सजाये है अपनी  जरूरतों  के रिश्तें , सुविधाओं के रिश्तें , कार,बंगलों मकानों के रिश्तें अवसरों के रिश्ते होली दिवाली  राखी के रिश्ते हजारों हजार रिश्तें  लेकिन क्या वास्तव में इनमे से कोई ऐसा  रिश्ता भी है जो कभी हमसे कहे-- कुछ  इस तरह तेरी पलकें , मेरी पलकों पे सजा दे .आंसूं  तेरे सारे ,मेरी पलकों पे सजा दे-----

कहने की बात है की बहारों से हम मिले --------------

सोमवार, नवंबर 22 By मनवा , In

पिछले दिनों किसी अवसर पर कई मित्रों ने बहुत सी शुभकामनाएं दी और कहा की , बहारें ही बहारें हों आपके जीवन में फूल ही फूल  खिल उठें कभी कोई गम ना आये और जाने क्या -क्या मैंने उनका शुक्रियां अदा किया और कहा की"" दुआ बहार की मांगीं तो इतने फूल खिले की कहीं  जगह  तक ना  मिली मेरे आशियाने को ""  खैर  दोस्तों ये तो बात शुरू करने का महज बहाना था लेकिन कभी कभी जिन्दगी में हमारी सारी मन्नतें  दुआएं  कबूल हो जाती  हैं और चारों और सिर्फ फूल ही फूल नजर आते हैं दूर तलक .हम हमेशा बहारों को ही आमंत्रित करते हैं और पतझड़  से बच कर निकलना चाहते हैं हम हमेशा फूलों में रहना चाहते हैं खुशबुओं  में जीना चाहते है रंगों की बरसात हो ,यादों का सैलाब हो और खुशियों की सौगात हो
लेकिन लेकिन लेकिन ज़रा  ठहरियें जिन्दगीं अब इतनी भी आसान  नहीं है की हमने जो चाहा वो  मिल ही जाए ज़रा ध्यान से देखिये तो सही इन नाजुक खुशबुदार फूलों के आसपास ये नुकीलें बदरंग सख्त कांटें क्या कर रहे हैं ? ये बिन बुलाएं  मेहमान  कहाँ  से चले आये ? इन्हें तो कभी भी निमंत्रित नहीं किया था और ना ही  कभी मन्दिर- मस्जिद में इनके लिए दुआएं की थी फिर ये कहाँ से चले आये ?
दोस्तों ,दरअसल ये खामोश   कांटें  दर्द के ग़मों के आह के प्रतिनिधि हैं ये फूलों की तरह आपको धोखा नहीं देते  ये अपने रंग नहीं बदलते  ये इतने नाजुक भी नहीं की  जीवन  की कठिन डगर पर आपका साथ छोड़  दे ये तो  इतने सच्चे है की इक बार आपके दामन से चिपके  तो फिर नहीं छूटते , जिन्दगी की उदास राहों पर ये आपके साथ आपके मन में टीस बन कर कसक बन कर  सालते हैं आपको  जिन्दा होने के अहसास से रूबरू  करवाते हैं ये दर्द की     धूप में फूलों की तरह कुम्हलातें नहीं है और ना ही वक्त की आंधी  से इनकी खुशबूं ही उड़ती है  माना  इनका कोई रंग नहीं लेकिन इनका संग तो हैं और आप ही बताएं जीवन में क्या चाहिए रंग या संग ?कौन ज्यादा टिकाऊ  है ?
दोस्तों ,तो असल बात ये है की  जीवन में बहारों  का साथ जरुर मागीयें लेकिन काँटों को भी अपनाइए  और  अन्तिम ----------- बात की किसी के जीवन में बहारों  को देख कर रश्क करने से पहले इक बार उन   काँटों की चुभन के बारें में भी सोचें जो फूलों के साथ मिले थे चुभे थे ,फूलों की नाजुक छुअनके पास बहुत पास काँटों के  नुकीले   तीर  कैसे अंतस को भेद गए थे कभी जरुर सोचना
सारी दुनिया आपकी जीवन की  क्यारी में खिलते गुलाब देख कर खुश होती है   आप  काँटों से आहत होकर  अपने  बहते लहू  को  देखते  हैं इस दर्द के दुःख के लहू से ही तो हमारे गुलाबों  ने  गुलमोहरों ने लाल रंग चुराया है ये गुलाब यक़ीनन कभी भी इतने सुर्ख नहीं होते की जब तक इनमे दिलका लहू नहीं घुलता  और जब चारों और जीवन में फूल खिलते दिख रहे हों बहार आती दिख रही हो तो मन में इक टीस सी उठ ही जाती है कभी कभी मन कह उठता है कहने की बात है की बहारों से हम मिले फूलों के   आसपास पास ही काँटों के गम मिले --